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यौनकर्मी महोत्सव: 'सेवा के बदले लेती हूं पैसे'

Tue, 04 Feb 2014 07:50 PM IST
बीबीसी
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पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में इन दिनों छह दिवसीय यौनकर्मी महोत्सव चल रहा है।
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देश के विभिन्न राज्यों से अपनी मांगों के समर्थन में दो सौ से ज्यादा यौनकर्मी, उनके हितों की लड़ाई में जुटे संगठनों के प्रतिनिधि और लोक कलाकार इस महोत्सव में पहुंचे हैं।

सोनागाछी रिसर्च एंड ट्रेनिंग सेंटर के प्रिंसिपल डॉक्टर समरजीत जाना कहते हैं, "दुर्बार महिला समन्वय समिति की ओर से आयोजित इस छह-दिवसीय उत्सव का मकसद महिलाओं की खरीद-फरोख्त रोकना, यौनकर्मियों को मौलिक अधिकार दिलाना और उनको उनने हक के प्रति जागरूक बनाना है।"
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'पेशे को तौर पर मिले मान्यता'

समरजीत जाना का कहना है कि यौनकर्मियों को भी एक पेशेवर के तौर पर मान्यता मिलनी चाहिए। दूसरे पेशों की तरह इसे भी कानूनी तौर पर पेशे का दर्जा दिया जाना चाहिए।

इस उत्सव की थीम है ‘प्रतिवादे नारी, प्रतिरोधे नारी' यानी महिलाओं का विरोध, महिलाओं का बचाव।

इस मौके पर बीबीसी ने कुछ यौनकर्मियों से उनके अतीत, इस पेशे की मौजूदा स्थिति और उनके हक की लड़ाई के बारे में बातचीत की।

सुनीता बारा, झारखंड

मैं अब स्वावलंबी और आत्मनिर्भर हूं। मैं पर्याप्त कमा लेती हूं। किसी को सेवा देती हूं तो बदले में मुझे पैसे मिल जाते हैं।

हम लोग अपने अधिकारों की लड़ाई के लिए यहां आए हैं। यौनकर्मियों को समाज में बहुत खराब निगाहों से देखा जाता है। मैं चाहती हूं कि दूसरी कामकाजी महिलाओं की तरह हमें भी इज्जत की निगाह से देखा जाए।

हम लोग दूसरी महिलाओं की तरह सम्मान और बराबरी का अधिकार चाहते हैं। आखिर हम भी एक सामान्य महिला हैं।

भाग्या, मैसूर

अपने बच्चों के पालन-पोषण और उनके स्कूल का खर्च उठाने के लिए मैं इस पेशे में आई थी। यह पेशा अच्छा है। इसकी कमाई से बच्चों का लालन-पालन बेहतर तरीके से हो रहा है और मैं भी बेहतर जिंदगी जी रही हूं।

मुझे इस पेशे में आने का कोई अफसोस नहीं है। हम चाहते हैं कि सरकार हमारा भी आधार कार्ड और पैन कार्ड बनवा दे। हमें सरकारी योजनाओं की जानकारी नहीं मिलती।

विभिन्न योजनाओं के तहत मिलने वाली सहायता भी हम तक नहीं पहुंचती। हमें पेंशन मिलनी चाहिए। हम अपने हक की लड़ाई को मजबूत करने यहां आए हैं।

सुल्ताना बेगम, राजस्थान

मैं इस पेशे में कैसे आई, यह तो बताना मुश्किल है। वक्त और हालात मुझे इसमें ले आए। अब हम अपना संगठन बनाकर अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। पहले यौनकर्मियों को काफी परेशानियां उठानी पड़ती थीं। अब पहले के मुकाबले दिक्कतें कम हुई हैं। रुपए में 40 पैसे कम हुई हैं लेकिन अब भी 60 पैसे बाकी हैं।

सबसे बड़ी समस्या यह है कि यौनकर्मियों के बच्चों को स्कूलों में दाखिला नहीं मिलता। यौनकर्मियों के बूढ़े हो जाने पर उनका गुजारा मुश्किल हो जाता है।

हम सरकार से चाहते हैं कि ऐसी यौनकर्मियों के लिए पेंशन की व्यवस्था हो। कोई भी यौनकर्मी 40-50 की उम्र के बाद यह पेशा नहीं कर पाती। सरकार 40 की उम्र के बाद हम यौनकर्मियों को भी दूसरे लोगों की तरह दो हजार रुपए महीने पेंशन दे।

सोनी देवी, पटना

इस पेशे से होने वाली कमाई से ही बाल-बच्चों को थोड़ा-बहुत पढ़ाया-लिखाया और घर का खर्च चलाते हैं। लेकिन अब हमारी उम्र ढल गई है। अब सरकार की ओर से कोई सहायता मिलती तो बढ़िया होता।

मेरे बेटों को कोई छोटी-मोटी नौकरी मिल जाती, हमें पेंशन मिलती तो जीवन कुछ आसान हो जाता। हमें अपना हक मिलना चाहिए।

यौनकर्मियों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक बनाने के लिए उत्सव में समाज के विभिन्न तबकों की भागादीर सुनिश्चित की गई है। इनें फिल्मकार गौतम घोष और साहित्यकार समरेश मजुमदार समेत देश के विभिन्न हिस्सों से आए कलाकार भी शामिल हैं।

भागीदारी

दुर्बार महिला समन्वय समिति की सचिव भारती दे कहती हैं, "हमारा संगठन इस पेशे में जबरन उतारी जाने वाली या नाबालिग युवतियों को बचाने की दिशा में ठोस काम कर रहा है। साथ ही हम यौनकर्मियों को उनका जायज हक दिलाने की भी लड़ाई लड़ रहे हैं।"

भारती का कहना है कि संगठन ने यौनकर्मियों के बच्चों की शिक्षा और बेहतर भविष्य के लिए भी कई योजनाएं शुरू की हैं ताकि उनकी आंखों में एक बेहतर भविष्य का सपना पैदा किया जा सके।
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संतान

सोनागाछी की एक यौनकर्मी की संतान पूजा कहती हैं, "हम यौनकर्मियों के बच्चों ने भी अपना संगठन आमरा पदातिक बनाया है। इसके तहत छोटे बच्चों की देखभाल के लिए नाइट सेंटर हैं। मां के पेशा करने पर छोटे बच्चे वहीं रहते हैं। कइयों को गीत और नृत्य का प्रशिक्षण दिया जाता है।"

वह बताती है कि सोनागाछी की यौनकर्मियों के दो बच्चे हाल में ही पौलैंड से फुटबॉल खेलकर आए हैं। उनको सेना में नौकरी मिल गई है।

महोत्सव में यौनकर्मियों को सूचना के अधिकार के बारे में भी जानकारी दी जा रही है।
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