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अब नहीं बच पाएंगे शातिर किशोर अपराधी

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केंद्र सरकार ने जघन्य अपराध के मामलों में किशोर को वयस्क अपराधी मानने पर संसदीय समिति की आपत्ति को खारिज कर दिया है।
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महिला एवं बाल विकास मंत्रालय दुष्कर्म, हत्या और तेजाब हमले जैसे जघन्य मामलों में 16 से 18 साल के किशोरों के कड़े दंड के पक्ष में है जबकि संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में सरकार को जघन्य अपराध के बावजूद किशोरों के साथ वयस्क अपराधियों की तरह व्यवहार नहीं करने की सलाह दी है।

संसदीय समिति के प्रस्ताव को नकारते हुए जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, 2014 का मसौदा कैबिनेट में चर्चा के  लिए भेज दिया गया है। कैबिनेट की आगामी बैठक में इस पर गंभीरता से विचार किया जाएगा। महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी इस बिल को मौजूदा बजट सत्र में ही संसद में पेश करना चाहती हैं।
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उन्होंने समिति की सिफारिशों को दरकिनार कर सीधे कैबिनेट में इस बारे में चर्चा करने का निर्णय लिया है। मसौदे पर कैबिनेट में होने वाली चर्चा के दौरान वे समिति की आपत्तियों पर अपना पक्ष रखेंगी। मेनका ने कहा कि उन्होंने विधेयक के मसौदे पर खुद गंभीरता से ध्यान दिया है।

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने की सिफारिश

संसदीय समिति ने दुष्कर्म, हत्या, तेजाब हमले जैसे जघन्य अपराध के मामले में 16-18 वर्ष की आयु के किशोरों के वयस्क अपराधी के तौर पर पेश किए जाने और विधेयक में किशोर शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई है। समिति किशोर अपराधी को दंडित करने के लिए आयु सीमा घटाने के पक्ष में नहीं है।

इस पर मेनका का कहना है कि वे यह समझाने की कोशिश करेंगी कि जघन्य अपराध के मामले में किशोर को किस तरह दंडित किया जाएगा इसका निर्णय जेजे बोर्ड को लेना है। जेजे बोर्ड में मनोवैज्ञानिक, बाल अधिकार से जुड़े एनजीओ, कानून विद् जैसे तमाम पक्षकारों को शामिल किया गया है।

अगर बोर्ड बाल अपराधी को सुधार गृह में रखने की जगह सामान्य अपराधियों की तरह कानूनी प्रक्रिया शुरू करने का निर्णय लेता है तो उस पर अमल किया जाएगा। लेकिन उन्हें वयस्क अपराधियों के साथ जेल में नहीं रखा जाएगा।

बल्कि उनके कारावास के लिए अलग और विशेष व्यवस्था होगी। वहीं 21 साल की आयु होने पर बाल अपराधी की मानसिक स्थिति की समीक्षा कर यह देखा जाएगा कि आगे उस पर किस तरह की कार्रवाई हो।
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जेजे एक्ट पर संसदीय समिति की सिफारिशों को नकारा

अगर उसकी मानसिक स्थिति में सकारात्मक बदलाव नजर आया तो 21 साल में किशोर अपराधी को रिहा भी किया जा सकता है। वे कैबिनेट के समक्ष इस दलील को पेश करेंगी।

गौरतलब है कि समिति ने सरकार को किशोर को वयस्क की तरह दंडित करने के प्रस्ताव की पुनर्समीक्षा करने की सलाह दी है। समिति का कहना है कि इस बिल का मसौदा तैयार करते समय में सभी हित धारकों से पर्याप्त विचार विमर्श नहीं किया गया है।

समिति ने प्रस्तावित बिल के कई प्रावधानों पर सवाल उठाते हुए इसे कानून का उल्लंघन और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की अवहेलना बताया है। यही नहीं किशोर को विशेष मामलों में दंडित करने के लिए आयु सीमा को घटाने के प्रस्ताव को संयुक्त राष्ट्र कनवेंशन का उल्लंघन भी बताया है।
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