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दंगा: नेताओं-अफसरों के उड़े होश, क्या करेंगे अखिलेश?

Thu, 14 Aug 2014 12:39 PM IST
चंद्रशेखर शर्मा/अमर उजाला, सहारनपुर
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बरसों से अमन और आपसी सौहार्द की अनूठी पहचान रखने वाले सहारनपुर को दंगे से दागदार करने में किन नेताओं, अफसरों और खुराफातियों की भूमिका रही। इसकी जांच के लिए पहले कैबिनेट मंत्री शिवपाल सिंह यादव और उसके बाद मेरठ के कमिश्नर भूपेंद्र सिंह ने अपनी जांच प्रक्रिया पूरी कर ली है।
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कमिश्नर ने तो बुधवार को ही तीन दिन की जांच पूरी कर दंगा पीड़ितों और दागियों की कहानी फाइलों में कैद कर ली। सहारनपुर में हुए दंगे की जांच के राज अब लखनऊ में ही खुलेंगे।

यही राज तय करेंगे कि सीएम अखिलेश यादव किन नेताओं और अफसरों पर गाज गिराएंगे या फिर किन पर उनकी मेहरबानी बनी रह सकती है।

दंगे में कुछ नेताओं और अफसरों की संदिग्ध भूमिका

इस जांच रिपोर्ट को लेकर सबसे ज्यादा उन नेताओं और अफसरों के होश उड़े हुए हैं जिनकी दंगे में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से संदिग्ध भूमिकाएं सामने आई हैं।

दंगे में पकड़े गए आरोपी मोहर्रम अली उर्फ पप्पू के साथ संबंधों को लेकर सीएम के दरबार तक मचे सियासी घमासान के बाद से सपा के कई बड़े नेता खुद को इसकी आंच से दूर करने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी धड़कनें भी जांच को लेकर तेज हैं। जांच के दौरान ही कई नेता इस चक्कर में जिले से लखनऊ तक सियासी आकाओं के यहां संपर्क में रहे हैं।

कैबिनेट मंत्री और कमिश्रर की जांच प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही शासन स्तर पर डीएम, एडीएम, एसपी सिटी का तबादला कर दिया गया है। इससे पहले छोटे स्तर पर ही कुछ कार्रवाई हुई और कई थानों में प्रभारियों को बदला गया। लेकिन दंगे के दागियों पर असली फैसला इन रिपोर्टों के बाद ही होगा।

दंगे के आरोपियों में नामजद नेता

-पूर्व विधायक इमरान मसूद, कांग्रेस
- मसूद कुरैशी, पूर्व सभासद
- विधान परिषद सदस्य उमर अली खान
- दिनेश सेठी, भाजपा नेता
- राजीव गुंबर, भाजपा नेता
-  हेमंत अरोड़ा, भाजपा नेता

इन नेताओं की भूमिका पर भी उठे सवाल      
- सपा उपचुनाव प्रत्याशी संजय गर्ग, पप्पू से संबंधों को लेकर
- पूर्व विधायक इमरान मसूद, पप्पू से संबंधों, दंगे में भूमिका
- सांसद राघव लखनपाल, दंगे के बाद की भूमिका पर
- दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री सरफराज खान, पप्पू के साथ संबंधों को लेकर
- राज्य मंत्री राजेंद्र राणा, दंगे के दिन देरी से सुध लेने पर
- कुछ अन्य नेताओं के बारे में गोपनीय रिपोर्ट भी गई हैं।
      
कुछ अफसर बदले, कुछ अब तक निशाने पर            
- संध्या तिवारी : डीएम के तौर पर दंगे के दिन मौके पर ही उपद्रवियों के सामने थीं। अब हो चुका तबादला।            
- राजेश पांडेय : जिले के एसएसपी के तौर पर मौजूद रहे। दंगा नियंत्रण में देरी को लेकर उनकी भूमिका की जांच हुई।
- दिनेश चंद्रा : एडीएम के रूप में दंगे के दिन मौके पर उपद्रवियों के सामने थे। अब हुआ तबादला। नए एडीएम ने चार्ज नहीं लिया।            
- वीपी सिंह : एसडीए के उपाध्यक्ष, विवाद वाले स्थल के नक्शे और अतिरिक्त निर्माण को लेकर जांच के घेरे में।            
- वैभव कृष्ण : एसपी सिटी के तौर पर दंगे के समय तैनात रहे। अब हो चुका तबादला।            
- कुंज बिहारी अग्रवाल : सिटी मजिस्ट्रेट के रूप में दंगे के समय रहे मौजूद। कुछ दंगा पीड़ितों ने इनकी भूमिका पर भी उठाए थे सवाल।            
- कुछ अन्य अफसरों की भी गोपनीय स्तर पर कुछ रिपोर्ट शासन को गई हैं।

पहली बार सामने आया पप्पू का परिवार

सांप्रदायिक दंगों के मास्टरमाइंड मोहर्रम अली उर्फ पप्पू का परिवार पहली बार सामने आया है। बुधवार को दंगों की जांच करने सहारनपुर आए मेरठ आयुक्त भूपेंद्र सिंह से पप्पू की पत्नी शहनाज और बेटा शादान मिला। बोले कि पप्पू को झूठा और फर्जी फंसाया गया है।

मेरठ आयुक्त की जांच का बुधवार को आखिरी दिन रहा। पूरा दिन शिकायतें लेकर पहुंचे पीड़ितों का तांता लगा रहा। इसी दौरान पहली बार दंगों के मास्टर माइंड मोहर्रम अली उर्फ पप्पू के परिजन भी सामने आये। पत्नी शहनाज और बेटा शादान ने मेरठ आयुक्त को सौंपे कागजात में बताया कि पप्पू को दंगों में फर्जी रूप से फंसाया गया है। वह क्षेत्र के चार बार सभासद रहे और समाजसेवा की है। करीब सात-आठ वर्ष पहले जब असकरी मस्जिद का मामला सामने आया तो समाज के लोगों ने पप्पू को पैरोकारी के लिए नियुक्त किया था। ब्लैकमेलिंग और रुपये ऐंठने के जो आरोप लगाए गए हैं, वह भी सरासर झूठे हैं।

बताया कि खुद गुरु सिंह सभा के पदाधिकारी मस्जिद की जमीन छोड़ने के लिए उससे सौदेबाजी के ऑफर करते रहे हैं, लेकिन वह कभी नहीं झुका। पुलिस ने उसके पुत्र दानिश, अन्य रिश्तेदारों को भी झूठा फंसाया है। मांग की कि दंगे की जांच किसी अन्य केंद्रीय एजेंसी से कराई जाए ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो जाए। मेरठ आयुक्त भूपेंद्र सिंह का कहना था कि यह विषय जांच का है कि कौन दोषी है और कौन निर्दोष। जांच निष्पक्ष और सहीं होगी।

दंगे की प्रशासनिक जांच पूरी, सर्वे पर आई 60 आपतियां

शहर में सांप्रदायिक दंगे के बाद तीन दिन तक सर्किट हाउस में चली प्रशासनिक जांच बुधवार को पूरी कर ली गई। जांच कर रहे मेरठ के कमिश्नर भूपेंद्र सिंह ने तीन दिन के छह सत्रों में करीब 250 पीड़ितों की सुनवाई की। सुनवाई का सबसे अहम बिंदू दंगा पीड़ितों को पहुंचे नुकसान और उनके पुनर्वास के लिए मुआवजे की समीक्षा करना रहा। इसके अलावा दंगे के कारण और इसमें अलग भूमिकाओं को लेकर पुलिस और प्रशासन के अफसरों से भी प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से जरूरी तथ्य जुटाकर जांच पूरी की गई।

जांच प्रक्रिया के आखिरी दिन कमिश्नर ने बताया कि दंगा पीड़ितों के यहां नुकसान के लिए प्रशासन की ओर से कराए गए सर्वे पर 60 आपतियां आई हैं। इनमें अधिकतर ऐसी रही कि नुकसान अधिक था और सर्वे में उसे काफी कम दिखाया गया। उन्होंने दावा किया कि सुनवाई के दौरान करीब 75 फीसदी लोगों को संतुष्ट पाया गया। बताया कि काफी संख्या में ऐसे पीड़ित मिले, जिनके व्यावसायिक प्रतिष्ठानों का वाणिज्य कर विभाग में पंजीकरण नहीं है। इसके चलते उनके सर्वे में भी काफी दिक्कतें आई हैं।

कमिश्नर ने पीड़ितों को भरोसा दिलाया कि अंपजीकृत कारोबारियों के नुकसान को भी घटना की स्थिति और सरकारी टीम के सहयोग से आंकलन कर राहत दिलाई जाएगी। इसके लिए आपति वाले मामलों का दोबारा सत्यापन कराया जाएगा। कुछ मामले ऐसे भी आए जिनमें सर्वे ही नहीं हुआ था, जबकि कुछ मामलों में सामान के नुकसान का तो सर्वे हुआ है, लेकिन भवन को पहुंचे नुकसान का अलग से सर्वे कराया जाना अभी बाकी है। इसलिए इस तरह के मामलों में फिर से होने वाले सत्यापन के बाद के बाद आगे का फैसला होगा।
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टाइटल का इस जांच से मतलब नहीं

शहर में हुए सांप्रदायिक दंगे की तीन दिन तक प्रशासनिक स्तर पर जांच करने के बाद मेरठ के कमिश्नर भूपेंद्र सिंह बुधवार को पहली बार मीडिया से मुखातिब हुए। गुरुद्वारा रोड की जिस जमीन के टाइटल को लेकर विवाद और दंगा हुआ, उस बारे में कमिश्नर ने साफ किया कि इस जांच का टाइटल से कोई मतलब नहीं था। यह तो न्यायालय से जुड़ा मामला है।

उन्होंने कहा कि शासन स्तर पर कुछ जांच बिंदू उन्हें दिए गए थे। उन्हीं के अनुरूप उन्होंने यहां तीन दिन तक जांच की। इसमें मुख्य रूप से घटना के कारण के साथ ही दंगा पीड़ितों को हुए नुकसान और दंगे में पुलिस व प्रशासन के अफसरों की भूमिका और लापरवाही की समीक्षा होनी थी। कमिश्नर से जब प्रेसवार्ता में पूछा गया कि क्या दंगे में पुलिस या प्रशासन के अफसरों की कोई भूमिका मिली है तो उन्होंने कहा कि वे अपनी जांच रिपोर्ट का तो कोई खुलासा नहीं करेंगे और यह रिपोर्ट शासन को ही दी जाएगी। तीन दिन तक दंगा पीड़ितों की सुनवाई हुई। अधिकतर सुनवाई से संतुष्ट ही रहे, जिनकी आपतियां आई हैं। उनका दोबारा सत्यापन कराया जा रहा है।

उन्होंने यह जरूर स्वीकार किया कि जांच में प्रशासनिक अधिकारियों को शामिल किया गया और उनसे बातचीत भी की गई। कुछ अधिकारी बचे हैं। उनसे भी जांच कर पूरी रिपोर्ट दी जाएगी। जब उनसे दंगे में लापरवाही और सुनियोजित साजिश के बारे में सवाल किया गया तो वह बोले कि उन्होंने सिर्फ यही कहा था कि अगर लापरवाही हुई तो ही कोई कार्रवाई होगी। उसी के लिए जांच हुई भी है। नेताओं और जनप्रतिनिधियों को जांच में शामिल करने के बारे में उन्होंने इतना ही कहा कि इसमें राजनैतिक लोगों को शामिल नहीं किया गया। हालांकि सभी नेताओं और संगठनों से भी फीडबैक जरूर लिया गया है। कमिश्नर ने कहा कि रिपोर्ट जल्द ही शासन को सौंप देंगे।
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