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न ब्लैकबोर्ड, न कुर्सियां, कैसे कहें 'स्कूल चलें हम'

Mon, 19 Aug 2013 03:47 PM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क
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एक तरफ स्कूलों में स्मार्ट क्लास लगाने और बच्चों को टेबलेट देने की बात कही जा रही है तो दूसरी ओर देश के एक चौथाई स्कूलों में ब्लैकबोर्ड ही नहीं है।
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देश में शिक्षा का अधिकार कानून लगाने होने के बाद भी स्कूलों को आधुनिक बनाना तो दूर यहां बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव है।

गैर सरकारी संस्था चाइल्ड रिलीफ एंड यू (क्राई) के एक सर्वे 'लर्निंग ब्लॉक्स' के मुताबिक भारत के प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल एक शिक्षण संस्थान की बुनियादी आवश्यकताओं को भी पूरा नहीं करते हैं। देश के महानगरों के स्कूलों तक में खस्ता हालत हैं।

यह सर्वे 13 राज्यों के 71 जिलों के 750 स्कूलों में किया गया है। इन 13 राज्यों में तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, केरल, कर्नाटक और तीन महानगर दिल्ली, कोलकाता व चेन्नई शामिल हैं।
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बच्चों के लिए न क्लास न स्वच्छ वातारण
अध्ययन में यह भी पता चला है कि 75 प्रतिशत स्कूलों में टेबल, कुर्सी और बेंच तक नहीं हैं। कक्षाओं की कमी के कारण 41 प्रतिशत स्कूलों में बच्चों को खुले मैदान में बैठाकर पढ़ाया जा रहा है। स्कूल में बिना चारदीवारी के खुले में हो रही पढ़ाई से बच्चों का ध्यान भी भटकता है और शिक्षक पढ़ा भी नहीं पाते।

बच्चों को स्वच्छ वातावरण उपलब्ध कराने के मामले में भी स्कूलों की खराब स्थिति है। 11 प्रतिशत स्कूलों में शौचालय नहीं हैं और 34 में शौचालय है तो वह इस्तेमाल के लायक नहीं है।

दो में से एक स्कूल में शौचालय के पास पानी तक नहीं है। उत्तर भारत के 70 प्रतिशत स्कूलों की स्थिति ऐसी ही है। आधे स्कूल शौचालय में हाथ धोने के लिए साबुन तक नहीं रखते। जबकि स्वस्थ रहने के लिए शौचालय इस्तेमाल करने के बाद हाथ धोना जरूरी माना गया है।

इतना ही नहीं करीब 80 प्रतिशत स्कूलों में शौचालय में सफाई के लिए कर्मचारी ही नहीं हैं। ऐसे में बच्चों को अस्वस्थ और गंदे वातावरण में पढ़ाई करनी पड़ती है।
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तकनीकी शिक्षा के लिए बिजली ही नहीं
देश के 44 प्रतिशत और पूर्वी भारत के करीब 74 प्रतिशत स्कूलों में बिना बिजली के ही पढ़ाई हो रही है। इससे बच्चों को कंप्यूटर शिक्षा देने की संभावना ही खत्म हो जाती है।

अध्ययन कहता है कि भारत में मुफ्त और अनिर्वाय शिक्षा के अधिकार कानून के बनने के तीन साल बाद भी स्कूल अनिर्वाय आवश्यकताओं को भी पूरा नहीं कर पाए हैं।

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