सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी अर्चना रामसुंदरम के तमिलनाडु द्वारा पदमुक्त नहीं किए जाने के बावजूद सीबीआई में तैनात किए जाने पर सवाल उठाए हैं। अर्चना को सीबीआई में अतिरिक्त निदेशक के रूप में शामिल किया गया है।
चीफ जस्टिस आरएम लोढ़ा, जस्टिस सीके प्रसाद और जस्टिस रोहिंगटन नरीमन की बेंच ने जानना चाहा कि तमिलनाडु सरकार द्वारा पदमुक्त नहीं किए जाने के बाद भी वह सीबीआई में कैसे शामिल हो गईं।
कोर्ट ने कहा कि यह नियुक्ति में एक और खामी है जो सरकार ने हमारे सामने रखी है। वह सरकार की अनुमति के बगैर शामिल नहीं हो सकती हैं। यदि राज्य सरकार ने अनुमति नहीं दी है तो उनके शामिल होने का कोई मतलब नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने अर्चना को ड्यूटी करने से रोका
सुप्रीम कोर्ट ने नौ मई को राज्य सरकार की ओर से दी गई जानकारी के बाद अर्चना रामसुंदरम को ड्यूटी करने से रोक दिया था। राज्य सरकार ने अदालत को बताया था कि रामसुंदरम को पदमुक्त नहीं किया गया है।
बेंच ने कहा कि राज्य सरकार की दलीलों के आलोक में स्थगनादेश जारी रखना न्यायोचित है। इससे पहले, केंद्र सरकार और सीबीआई ने आग्रह किया था कि रामसुंदरम को इस मामले के लंबित रहने के दौरान अपना काम करने की अनुमति दी जाए।
अदालत इस मामले में जल्द सुनवाई के लिए सहमत हो गई और सुनवाई की अगली तारीख 21 जुलाई निर्धारित की। अदालत ने संबंधित पक्षों से कहा कि वे अपने जवाब और संबंधित दस्तावेज दाखिल करें।
कौन हैं अर्चना रामसुंदरम
भारतीय पुलिस सेवा की 1980 बैच की तमिलनाडु काडर की अधिकारी अर्चना रामसुंदरम सीबीआई में उप महानिरीक्षक के पद पर और फिर प्रथम महिला संयुक्त निदेशक के पद पर काम कर चुकी हैं।
रामसुंदरम ने 1999 से 2006 के दौरान आर्थिक अपराध से संबंधित कई मामलों को देखा था। रामसुंदरम की नियुक्ति को पत्रकार विनीत नारायण ने चुनौती दी है।
विनीत नारायण का तर्क है कि यह नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट के फैसले को नजरअंदाज करते हुए मनमाने तरीके से की गई है। नारायण का कहना है कि एक अन्य आईपीएस आरके पचंदा को नजरअंदाज करके अर्चना को चुना गया।
इस बीच पचंदा ने भी सुप्रीम कोर्ट में पक्षकार बनने के लिए अर्जी दायर की। उनका कहना है कि सीबीआई निदेशक ने अपने हलफनामे में गलत बयानी की है।
सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें पक्षकार बनाने से इनकार कर दिया लेकिन साथ ही कहा कि वह सीबीआई निदेशक के कथन को कार्यवाही से हटाने के लिए अनुरोध कर सकते हैं।