फाइव स्टार होटलों को छोड़ किसी अन्य प्रतिष्ठानों को बार लाइसेंस देने पर पाबंदी के केरल सरकार के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने मुहर लगा दी है। इस फैसले के बाद अब राज्य में सिर्फ फाइव स्टार होटलों में ही शराब परोसी जाएगी।
शीर्ष अदालत ने एक अहम फैसले के जरिए यह संदेश दिया है कि अगर मामला लोगों के स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ हो तो शराब की बिक्री पर राज्य सरकार द्वारा अतर्कसंगत पांबदी भी जायज है। यह फैसला सभी राज्य सरकारों के लिए इशारा है कि भले ही शराब के सेवन पर पाबंदी लगाना संभव न हो लेकिन नियंत्रित तो किया जा सकता है।
न्यायमूर्ति विक्रमजीत सेन और न्यायमूर्ति शिवकीर्ति सिंह की पीठ ने तीन और चार सितारा होटल के बार मालिकों की याचिकाओं को ठुकराते हुए राज्य सरकार की आबकारी नीति को सही ठहराया है। पीठ ने राज्य सरकार की उस दलील को सही ठहराया है कि इस पाबंदी का बार के साफ-सुथरा होने से कोई लेना देना नहीं है बल्कि यह देश के स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ मसला है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि अल्कोहल के नियमित और अत्याधिक सेवन को हतोत्साहित करने के लिए राज्य द्वारा सख्त नियंत्रण आवश्यक हो जाता है। इसलिए पांच सितारा प्रतिष्ठानों को छोड़ अन्य को बार लाइसेंस न देना एक सकारात्मक कदम के रूप में देखा जा सकता है। ऐसा करने से निश्चय ही शराब के सेवन में कमी आएगी।
अदालत को है परिवारों का ख्याल
पीठ ने अपने फैसले में कहा है कि यह जानते हुए कि शराब के सेवन के कारण परिवार पर सामाजिक धब्बा लगता है, अदालत आंखें मूंदकर नहीं रख सकता। अल्कोहल के मुफ्त व्यापार से परिवार का संसाधन नष्ट होता है और इसका सबसे अधिक असर महिलाएं और बच्चों पर पड़ता है।
शीर्ष अदालत ने अपने आदेश में कहा है कि हमें राज्य द्वारा अंतरिम नीति के जरिए सार्वजनिक रूप से अल्कोहल केसेवन पर लगाम लगाने में कुछ भी गैरकानूनी या अतर्कसंगत नहीं नजर आता।
पीठ ने कहा है कि अदालत को इस तरह की नीति को प्रोत्साहित करने की जरूरत है और न कि ऐसी नीतियों को निरस्त करने की जरूरत है।
शराब के कुल सेवन का 14 फीसदी केरल में
सुप्रीम कोर्ट ने केरल सरकार को इस दलील को स्वीकार किया है कि राज्य में अल्कोहल का सेवन बड़े पैमाने पर फैल रहा है। देश में होने वाले शराब के कुल सेवन का 14 फीसदी सौ प्रतिशत साक्षरता वाले इस छोटे से राज्य में होता है।
पीठ ने तीन सितारा और चार सितारा होटल के बार मालिकों की इस दलील को ठुकरा दिया कि उनके साथ भेदभाव हो रहा है।
पीठ ने पाया कि पांच सितारा होटलों को इनसे मुक्त रखने के पीछे पर्यटन को बढ़ावा देना है।