सुप्रीम कोर्ट ने पत्नी को पीटे जाने को निचली अदालत द्वारा ‘शादीशुदा जीवन का आम तथ्य’ कहे जाने पर कड़ी नाराजगी जताई है। सर्वोच्च अदालत ने कहा है कि जजों की महिलाओं की परेशानी के मुद्दे पर संवेदनशील होना चाहिए। महिला का उत्पीड़न उसके सम्मान के खिलाफ है। इस तरह की मानसिकता महिलाओं के खिलाफ अपराध को बढ़ावा देने वाली है। इसमें हर हाल में बदलाव जरूरी है।
जस्टिस आफताब आलम की अध्यक्षता वाली पीठ ने वीवी अंवेकर की ओर से कर्नाटक हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर अपील को खारिज करते हुए कहा है कि संविधान में महिलाओं को संरक्षण प्रदान किया गया है। अन्य कानून भी अदालतों को न्याय करने के लिए प्रदान किए गए हैं, लेकिन हमें महिलाओं की दिक्कतों के प्रति संवेदनशील रहना चाहिए। इस मामले में निचली अदालत ने तीनों आरोपियों को छोड़ दिया था।
वहीं हाईकोर्ट ने दहेज के लिए पत्नी को परेशान करने वाले पति को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी। जबकि ससुराल पक्ष के अन्य दो को बरी कर दिया था। अंवेकर की पत्नी गिरिजा ने उत्पीड़न से तंग आकर जहर खाकर आत्महत्या कर ली थी। निचली अदालत ने इस मामले में दिए गए फैसले में कहा था कि विवाहित जीवन में पत्नी की पिटाई एक आम तथ्य है।
सर्वोच्च अदालत ने इस पर अफसोस जताते हुए कहा कि इसका मतलब तो यह है कि पति यदि पत्नी को एक-दो चांटे मारता है तो बड़ी बात नहीं है। हमारी राय में यह सही सोच नहीं है। अदालत का फैसला एक तरह से महिलाओं का उत्पीड़न किए जाने को सामाजिक तौर पर सही ठहराता है। हमारी राय में जजों को महिलाओं की परेशानियों के प्रति संजीदा होना चाहिए।
हालांकि सेशन जज की ओर से दर्ज की गई स्थितियों में स्पष्ट किया गया है कि गिरिजा की आत्महत्या से संबंधित परिस्थितियां बहुत कठिन नहीं थीं। लेकिन एक बात प्रकाश में आई है कि गिरिजा की आंख की रोशनी थप्पड़ की वजह से ही गई थी। सर्वोच्च अदालत ने कहा कि हमारी आपत्ति सेशन जज की टिप्पणियों पर है। हाईकोर्ट का फैसला इस मामले में सही है, अदालत उसके खिलाफ दायर अपील को खारिज करती है।