दीपावली के मौके पर कर्मचारियों को बोनस और उपहारों की चर्चा आम होती है, लेकिन सूरत के एक हीरा कारोबारी ने अपने करीब 1200 कर्मचारियों को कार, मकान, और गहने जैसे कीमती उपहार देकर पूरे उद्योग जगत का ध्यान खींचा है।
कर्मचारियों को दीपावली के मौके पर कीमती उपहार बांटने वाले हीरा ब्यापारी सावजी ढोलकिया का कारोबार करीब 3000 करोड़ का है। लेकिन इतना बड़ा ब्यापार खड़ा करने पीछे एक बेहद मार्मिक कहानी छुपी है जिसे उन्होंने खुद एक टीवी चैनल को इंटरव्यू के जरिए उजागर किया है।
उनके इस इंटरव्यू के प्रमुख अंशों में पढ़िए कि एक सामान्य परिवार का शख्स आज इतना अमीर कैसे बना? और कैसे कई देशों में खड़ा किया अपना हीरा कारोबार? पढ़ें पूरी रिपोर्ट।
सावजीभाई का बचपन
सावजी भाई ढोलकिया का जन्म अमरेली जिले के एक छोटे से गांव में हुआ था। ढोलकिया का मन पढ़ने में न लग रहा था तो यह 13 वर्ष की उम्र में ही सूरत भाग गए और एक छोटी से फैक्ट्री में काम करने लगे।
सूरत से पांच-छह महीने में लौटकर जब ये घर पहुंचे तो इनके पिता ने पढ़ने के लिए समझाया लेकिन इन्हें पढ़ाई से डर लगता था। जिससे यह फिर सूरत चले गए और इसी तरह दो-तीन बार किया।
इसी बीच ढोलकिया की मां उन्हें पास बुलाकर समझाया कि सभी के बच्चे काम करते हैं, पूजा करते हैं तो वह भी कुछ काम करे और अच्छा आदमी बने। ढोलकिया बताते हैं मां उन्हें अक्सर समझातीं और इमोशनली ब्लैकमेल करती तो एक दिन ठान लिया कि अब अच्छा आदमी बनना है।
ढोलकिया के अनुसार, एक दिन स्वामी नारायण संप्रदाय के एक साधु के पास गए। उनका परिवार पिछली कई पीढ़ियों ने उनका स्वामी नारायण सम्प्रदाय का अनुयाई है।
उनके अनुसार उन्होंने साधु से पूछा कि वह उनका जीवन खुशहाल बनाने के लिए कुछ उपाए बताएं। इस पर साधु ने सकाम भक्ति के तहत 108 नामों का एक मंत्र बताया और उसे 11 लाख बार जाप करने के लिए कहा। और कहा कि इतना करने के बाद कोई भी कुछ करना चाहे तो कर सकता है।
साधु के इस उपाय को करने के बाद ढोलकिया के अंदर एक बड़ा आत्म विश्वास जगा कि वह अब कुछ भी कर सकते हैं। इसी ध्येय के साथ अब वह फिर से नौकरी करने सूरत के चले आए।
ढोलकिया की पहली नौकरी
ढोलकिया ने बताया कि सूरत की एक फैक्ट्री में वह 179 रुपये प्रति माह पर नौकरी करने लगे जिसमें खाने-पीने में 140 रुपए खर्च करने के बाद 39 रुपये बचा करते थे। इसी फैक्ट्री में दिनेश नामका उनका दोस्त था जिसकी सैलरी उस वक्त एक हजार से 1200 रुपये तक थी।
उन्होंने अब अपने दोस्त जैसा काम करके ज्यादा पैसे कमाने की सोची तो तीन-चार महीने के प्रयास से वह अपने दोस्त के विभाग में पहुंच गए। वहां कुछ दिनों तक काम सीखा और फिर अपने दोस्त से ज्यादा सैलरी उठाने लगे। और उनका यह काम था हीरा घिसने का।
सावजी भाई बताते हैं कि उन्होंने करीब 10 साल तक हीरा घिसने का काम किया और इसके बारे में काफी अनुभव हुआ तो अपने घर में कुछ दोस्तों के साथ हीरा घिसने का काम शुरू किया जो धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा।
1991 में एक करोड़ की हुई कंपनी
ढोलकिया आगे बताते हैं कि कारोबार आगे बढ़ाना था तो कंपनी बनाना और उसकी मार्केटिंग करना भी जरूरी था जिसके लिए वह मुबई पहुंच गए। उनके अनुसार मुबई में उन्होंने एक बिजनेस सलाहकार की सेवा ली और फिर कंपनी का रजिस्ट्रेशन कराके मार्केटिंग का काम शुरू किया।
ढोलकिया की हरि कृष्ण डायमंड नाम की कंपनी का कारोबार 1991 में मात्र एक करोड़ का था तो मार्च 2014 तक 2100 करोड़ तक पहुंच गया है। उनके अनुसार इस वर्ष के अंत तक डायमंड एक्पोर्ट का लक्ष्य 2800 करोड़ का रखा गया है जो आसानी से पूरा हो जाएगा।
ढोलकिया के अनुसार उनकी कंपनी अभी 50 देशों के लिए ही हीरा सप्लाई करती है। दुनिया के 200 देश अभी बांकी है।
हरि कृष्ण डायमंड के दुनिया के सात देशों में खुद के आउटलेट्स हैं। इसके अलावा दुनिया भर के 5000 हजार शोरूमों में इनका हीरा उपलब्ध है।
हाल ही में ढोलकिया ने कर्मचारियों को मंहगे तोहफे दिए हैं लेकिन कर्मचारियों से काम कराने का उनका नजरिया भी अलग है।
कर्मचारियों से कैसे काम लेते हैं ढोलकिया?
कर्मचारियों से काम लेने के बारे में ढोलकिया बताते हैं कि उनकी कंपनी में कोई भी एमबीए, बीबीए या कोई डिप्लोमाधारी को उनके यहां जरूरी वेतन के साथ पांच साल तक ट्रेनिंग पर रखा जाता है। इस दौरान कर्मचारियों को इस स्तर का ज्ञान दिया जाता है कि वह कंपनी चला सके।
सावजी भाई ढोलकिया बताते हैं कि उनके पास 35 साल काम करने का अनुभव है और इसी के बराबर वह अपने हर कर्मचारी को पांच साल में सिखा देते हैं ताकि वह उनसे ज्यादा अच्छा काम कर सके।
इतना ही नहीं वह कर्मचारियों को लेके उनका नजरिया भी अलग होता है। उनका कहना है कि उनकी काशिश होती है कि कर्मचारी से ऐसे काम लिया जाए, ऐसी सैलरी दी जाए जिससे की वह खुशी के साथ काम करे।
उनका कहना है किसी कर्मचारी पर उनका ध्यान खुश रखने पर केंद्रित होता है और कर्मचारियों का ध्यान कंपनी को प्रॉफिट दिलाना।
ढोलकिया अपनी मां की इस बात को सबसे ज्यादा जोर देकर कहते हैं कि उनकी मां का कहना है अच्छा आदमी बनना है और अच्छा आदमी कैसा होता है? वह हमेशा अपने कर्मचारियों यही अनुभव कराने की कोशिश करते हैं।
इतना ही नहीं वह कहते हैं उनकी कोशिश होती है कि वह अपने कर्मचारी से ऐसा व्यवहार करें जैसे की अपने बेटे से करते हैं और इसकी जरा भी परवाह नहीं करते कि वह काम सीख जाएगा तो अपना बिजनेस शुरू कर देगा।