महाराष्ट्र में चुनाव जीत कर भाजपा ने एक बड़ी चुनौती पार कर ली है। लेकिन महाराष्ट्र के नए मुख्यमंत्री के सामने इससे भी बड़ी चुनौती मुंह बाये खड़ी होगी। आर्थिक मोर्चे पर अव्वल यह राज्य अब इन्फ्रास्ट्रक्चर, संतुलित विकास और बेहतर गवर्नेंस के मोर्चे पर पिछड़ता जा रहा है। नई सरकार को इस पिछड़ेपन को थामना होगा।
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भले ही भारतीय अर्थव्यवस्था का ग्रोथ इंजन कहे जाने वाले महाराष्ट्र की देश की जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद ) में 16.26 फीसदी हिस्सेदारी हो और यह 9.77 फीसदी की रफ्तार से आर्थिक विकास कर रहा हो लेकिन इसे गुजरात, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक जैसे राज्यों से चुनौती मिलने लगी है।
यह बिना वजह नहीं है कि हाल में जब गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल ने महाराष्ट्र के उद्योगों को अपने यहां का न्योता दिया था तो शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने बेहद तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी।
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महाराष्ट्र की एक बड़ी समस्या- असमान विकास
असमान विकास महाराष्ट्र की एक बड़ी समस्या है। चीनी, कॉटन और फल उद्योग पश्चिम महाराष्ट्र में केंद्रित हैं। महाराष्ट्र के ताजा आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक पश्चिमी इलाके के मुंबई और ठाणे में प्रति व्यक्ति आय क्रमश: 1,67,736 और 1,50,969 रुपये है। वहीं, मराठवाड़ा के जालना और बीड़ जैसे पिछड़े इलाकों में यह यह सिर्फ 59,010 और 55,009 रुपये है। विदर्भ के नक्सल प्रभावित गढ़चिरौली में यह आय 58,469 और यवतमाल में 63,900 रुपये है।
मशहूर अर्थशास्त्री और रिजर्व बैंक के पूर्व डिप्टी गवर्नर एसएस तारापोर कहते हैं कि पूरा विकास पश्चिमी इलाकों में केंद्रित हो गया है, जहां चीनी, कॉटन और फल उद्योग है, जबकि मराठवाड़ा और विदर्भ पानी की भयंकर समस्या से जूझ रहे हैं। पश्चिमी इलाके में गन्ने के खेतों को तो खूब पानी मिलता है, लेकिन विदर्भ में आत्महत्या करने वाले किसानों की तादाद बढ़ती जा रही है।
मुंबई देश को सबसे ज्यादा टैक्स देता है लेकिन यहां इन्फ्रास्ट्रक्चर का बुरा हाल है। पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा था कि वह महाराष्ट्र में तटीय इलाकों के विकास पर ध्यान देंगे और ये इंडस्ट्री हब होंगे लेकिन इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित किए बगैर यह कैसे होगा। मुंबई में अभी तक सी-लिंक प्रोजेक्ट पूरा नहीं हो सका है, जबकि चीन में एक साल में ऐसे दस प्रोजेक्ट पूरे हो जाते हैं।
गुजरात बना महाराष्ट्र का बड़ा प्रतिद्वंदी
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी (एनआईपीएफ) के प्रोफेसर एनआर भानुमूर्ति कहते हैं कि नई सरकार से उम्मीद तो बनती है और महाराष्ट्र आर्थिक विकास में सबसे आगे भी है लेकिन बढ़ते भ्रष्टाचार को काबू करना होगा। साथ ही इंडस्ट्री के नए हब विकसित करने होंगे।
मुंबई का मशहूर ऑटो हब पुणे-चिंचवाड़ पिछड़ रहा है और उसकी तुलना में चेन्नई-श्रीपेरंबुदूर, गुडग़ांव-मानेसर और गुजरात में साणंद जैसे ऑटो हब तेजी से तरक्की कर रहे हैं। यहां तक उद्योगों के लिए महाराष्ट्र से बेहतर बिजली सप्लाई मध्य प्रदेश में है।
हाल के दिनों में गुजरात महाराष्ट्र के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी के तौर पर उभरा है। रेटिंग एजेंसी केयर रेटिंग के प्रमुख अर्थशास्त्री मदन सबनवीस कहते हैं कि महाराष्ट्र को अपने हाथ से फिसलते जा रहे उद्योगों को रोकना होगा। महाराष्ट्र बिजली, पानी की समस्या से जूझ रहा है। उद्योगों को बुनियादी सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। राज्य की लालफीताशाही औद्योगिक इकाइयां लगाने में अड़चनें पैदा कर रही हैं और उधर गुजरात उद्योगों को सिंगल विंडो सिस्टम और बेहतर बिजली सप्लाई दोनों मुहैया करा रहा है।
गुजरात में छोटे-छोटे बंदरगाह तेजी से विकसित हो रहे हैं, जबकि महाराष्ट्र में जवाहरलाल नेहरू पोर्ट के आधुनिकीकरण का काम पिछड़ा हुआ है। अगर महाराष्ट्र को खुद को दौड़ में आगे रखना है तो उसे अपने सेवा उद्योग मसलन एजुकेशन, पर्यटन और आईटी सर्विस इंडस्ट्री के लिए भी नई नीतियां बनानी होंगी।
1. असमान आर्थिक विकास 2. इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास की धीमी रफ्तार 3. भ्रष्टाचार 4. बेहतर गवर्नेंस की कमी 5. उद्योगों की राह में लालफीताशाही का रोड़ा 6. बिजली और पानी की किल्लत 7. ऑटो समेत कई इंडस्ट्री में खोता वर्चस्व 8. मुंबई में विकास को रफ्तार नहीं 9. सर्विस इंडस्ट्री की बादशाहत भी खतरे में 10. कृषि विकास के मोर्चे पर ज्यादा तरक्की नहीं