सुप्रीम कोर्ट टूटती शादी को बचाने के लिए पत्नी की ओर से रखी गई एक अनोखी शर्त का गवाह बना। पति ने पत्नी के कहे अनुसार रिटायरमेंट के बाद गांव से बाहर घर बनाकर उसके साथ अलग रहना स्वीकार कर लिया। पत्नी को मनाने के लिए पति को उसकी भविष्य की योजनाओं पर भी मंजूरी देनी पड़ी जो समझौते के दौरान तैयार की गईं। सर्वोच्च अदालत ने दोनों पक्षों की रजामंदी पर खुशी जताते हुए उनकी ओर से दायर याचिकाओं को खारिज कर दिया।
उत्तराखंड, रानीखेत का यह मामला गत वर्ष तब शीर्षस्थ अदालत पहुंचा था, जब पत्नी ने पति के खिलाफ उत्तराखंड में चल रहे मुकदमे को स्थानांतरित करने की मांग वाली याचिका दायर की। तलाक के लिए सर्वोच्च अदालत में दायर होने वाले मामलों में न्यायाधीशों का पहला प्रयास यही रहता है कि पति-पत्नी एक हो जाएं। जरा भी संभावना होने पर अदालत ऐसे मामले को समझौता केंद्र भेजती है। इस मामले में भी ऐसा ही हुआ।
सेना में कार्यरत पति से नाराज पत्नी ने तमाम शर्तें रखीं जिनमें से एक अनोखी शर्त यह भी थी कि पति रिटायर होने के बाद गांव से बाहर कहीं भी घर बनाकर उसके साथ अलग रहेगा। पति के रजामंद होते ही समझौता हो गया। अब दोनों नए सिरे से अपने वैवाहिक जीवन को खुशहाल बनाने का प्रयास करेंगे। हालांकि पत्नी की ओर से रखी गईं सभी शर्तों को मानने के लिए पति अब बाध्य है।
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों की ओर से उत्तराखंड व अन्यत्र स्थानों पर दाखिल तमाम मामलों का निपटारा करते हुए अपने आदेश में पत्नी की शर्तों को पति की ओर से स्वीकार किए जाने को दर्ज किया है। जस्टिस आरएम लोढ़ा की अध्यक्षता वाली पीठ ने पति के खिलाफ घरेलू हिंसा का आपराधिक मामला, जबकि पत्नी के खिलाफ सिविल मामले का निपटारा कर दिया है।
गौरतलब है कि सेना में कार्यरत पति ने फिलहाल पत्नी को उसके परिजनों के साथ रहने और इसके एवज में तीन हजार रुपये मासिक खर्च देने की शर्त भी मानी है। साथ ही पत्नी से मिलने आने से सात दिन पहले सूचना देने की शर्त को भी स्वीकार किया है।