धर्म के आधार पर किसी भी तरह की हिंसा को बर्दाश्त न करने के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बेहद असहज है।
संघ नेतृत्व का मानना है कि जिस समय पर और जिस मंच पर प्रधानमंत्री ने यह बात कही है, उससे कहीं न कहीं संघ के हिंदुत्व के एजेंडे को चोट पहुंची है और इससे अमेरिकी दबाव का संदेश भी गया है।
संघ नेता इसे सरकार की अमेरिका के प्रति बढ़ती निकटता का संकेत भी मान रहे हैं। लेकिन संघ नेता सार्वजनिक रूप से इस मुद्दे पर खामोश हैं।
कानपुर में हुई संघ नेताओं की बैठक के बाद संघ के शीर्ष नेता अपने अपने कार्यक्रमों के लिए अलग अलग स्थानों के लिए निकल गए। लेकिन प्रधानमंत्री के बयान को लेकर संघ के नेताओं ने आपस में जो बातचीत की है, उसकी जानकारी देते हुए संघ के एक नेता ने बताया कि जब देश की संसद में प्रधानमंत्री से इस मुद्दे पर बोलने की मांग की जा रही थी और संसद का कामकाज ठप रहा, तब तो प्रधानमंत्री चुप रहे।
धार्मिक सहिष्णुता को लेकर बयान
संघ का मानना है कि अगर उन्हें अपनी सरकार का पक्ष रखना था, तो संसद से बेहतर कौन सा मंच हो सकता है।
लेकिन जिस तरह अमेरिकी राष्ट्रपति ने पहले भारत में फिर अमेरिका में जाकर भारत की धार्मिक सहिष्णुता के प्रतिकूल बयान दिया उसमें सीधा निशाना संघ के हिंदुत्व एजेंडे को आगे बढ़ाने वाले अनुषांगिक संगठनों पर साधा गया।
इसके बाद जिस तरह दो पादरियों को संत की उपाधि देने के उपलक्ष्य में आयोजित समारोह में प्रधानमंत्री ने यह बयान दिया, उससे यह संदेश गया कि कहीं न कहीं अंतर्राष्ट्रीय दबाव काम कर रहा है। संघ नेता इसे लेकर खासे चिंतित दिख रहे हैं।
आरएसएस ने बनाई खास रणनीति
हालांकि सर संघ चालक मोहन भागवता ने साक्षी महाराज, साध्वी प्राची आदि के हिंदुओं को ज्यादा बच्चे पैदा करने वाले बयान को खारिज करते हुए कहा है कि हिंदु महिलाएं बच्चे पैदा करने की फैक्ट्रियां नहीं हैं।
साथ ही विश्व हिंदू परिषद के नेताओं को भी ऐसे बयान ने देने की नसीहत दी गई है जिससे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की परेशानी बढ़े। इस नेता केमुताबिक संघ नेतृत्व अमेरिका के प्रति सरकार के बढ़ते झुकाव से असहज है।
गणतंत्र दिवस पर ओबामा को भारत बुलाने से लेकर ओबामा के बयानों तक ने संघ को असहज किया। लेकिन संघ अभी अपनी ही सरकार को ज्यादा असहज नहीं करना चाहता है, इसलिए संघ नेतृत्व ने फिलहाल इस मामले में खामोशी ओढ़ ली है।