कांग्रेस उपाध्यक्ष बनने के बाद पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के रूप में पहली अग्निपरीक्षा दे रहे राहुल गांधी का सियासी सच से सामना हो गया है।
दरअसल, राहुल ने चुनाव से पहले टिकट बंटवारे के लिए कड़े मानदंड बनवाए थे। इसे लागू करने की कोशिश भी हुई, मगर इसे पूरी तरह से जमीन पर उतारा नहीं जा सका। जिताऊ उम्मीदवारों और बड़े नेताओं के दबाव में टिकट बंटवारे के दौरान कई ऐसे फैसले हुए, जिसमें राहुल गांधी के सख्त नियमों की धज्जियां उड़ गई।
जयपुर चिंतन शिविर में राहुल गांधी ने उपाध्यक्ष की कुर्सी संभाली थी। शिविर में जयपुर घोषणा पत्र पारित हुआ था, जिसमें टिकट बंटवारे के नियम भी लिखे गए थे।
विधानसभा चुनाव से पहले राहुल ने चुनावी राज्यों की बैठक ली, कड़े नियम बनाए और इन्हीं नियमों के अनुसार टिकट देने को कहा। उसी समय चुनाव की जिम्मेदारी संभाल रहे कांग्रेसी दिग्गजों ने महसूस किया था कि इन नियमों को लागू करना बेहद मुश्किल होगा। अमर उजाला ने उस समय दिग्गजों की इस दिक्कतों को लिखा भी था।
नियमों में कहा गया था कि 15 हजार से ज्यादा वोटों से हारे उम्मीदवारों को टिकट नहीं मिलेगा। दो बार लगातार हारे उम्मीदवारों को भी टिकट नहीं मिलेगा। जमानत जब्त होने वाले उम्मीदवरों को टिकट नहीं मिलेगा। एक हजार से कम वोट से हारे उम्मीदवारों को टिकट मिलेगा। मौजूदा विधायकों पर स्थितियों के हिसाब से फैसला लिया जाएगा।
राहुल का सबसे बड़ा निर्देश कांग्रेस के मैनेजरों को सबसे ज्यादा परेशान कर रहा था और वह था दल-बदलुओं को टिकट नहीं देने का। बहरहाल, टिकट बंटने के बाद कई मामलों में मानदंड धवस्त हो गए। जैसे कि राजस्थान में मलखान सिंह, बाबू लाल नागर और परसराम मदेरड़ा जैसे जेल में बंद दागियों के रिश्तेदारों को टिकट दिया गया।
राजस्थान में ही प्रदेश अध्यक्ष चंद्रभान सिंह और वसुंधरा राजे के खिलाफ लड़ने वाली मीनाक्षी चंद्रावत लगातार दो बार हारी है। इसी तरह सांसद प्रेमचंद गुड्डू के बेटे को टिकट नहीं मिला तो उन्होंने पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार का पर्चा ही खारिज करवा दिया और अपने बेटे को उम्मीदवार घोषित कर दिया।
दिल्ली में भाजपा और बसपा से आए नेताओं को टिकट दिया गया। राजस्थान में कई ऐसे उम्मीदवारों को टिकट दिया गया है, जिनकी उम्र 75 साल से भी ज्यादा है। छत्तीसगढ़ में कई बाहरी लोगों को टिकट दिया गया है।