स्कूलों में गीता पढ़ाने की बात कहने वाले सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस एआर दवे के समर्थन में संघ भी सामने आया है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक वरिष्ठ विचारक का कहना है कि यह मात्र एक धार्मिक शास्त्र नहीं बल्कि यह आध्यात्मिक और दार्शनिक शास्त्र है। इसके चलते इसे राष्ट्रीय किताब घोषित किया जाना चाहिए।
जस्टिस दवे के बयान का प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन मार्कंडेय काटजू ने विरोध करते हुए इसे संविधान के खिलाफ करार दिया था।
'गीता राष्ट्रीय किताब घोषित हो'
संघ के सांस्कृतिक फोरम भारतीय विचार केंद्रम के डायरेक्टर पी परमेश्वरन ने कहा कि गीता सदियों से भारत को गहराई से प्रभावित करती रही है।
जिन्होंने एक बार भी भगवद् गीता पढ़ी है, वह अच्छी तरह से जानता है कि यह धार्मिक किताब नहीं है। उन्होंने कहा कि इसकी तरह अन्य किसी किताब का व्यापक सर्कुलेशन नहीं रहा है और यह कई व्याख्याओं के साथ प्रकाशित हुई है।
परमेश्वरन ने अपने एक बयान में कहा कि गीता का प्रभाव समय और स्थान से परे है। यह किसी भी बुद्धिजीवी व्यक्ति के लिए ज्ञान का खजाना है और इसका प्रभाव अनंत है।
जस्टिस दवे ने दिया था बयान
महात्मा गांधी गीता को अपनी मां कहते थे और वह कहा करते थे कि वह जब भी भ्रमित और दुखी होते थे तो वह गीता की शरण में जाते थे। गीता ने हमारे स्वतंत्रता आंदोलन को भी काफी प्रभावित किया।
उन्होंने गीता को भारतीय संविधान की ओरिजनल कापी बताते हुए कहा कि गीता को देश की राष्ट्रीय किताब घोषित कर देना चाहिए। जस्टिस एआर दवे ने शनिवार को कहा था कि यदि वह तानाशाह होते तो वह पहली कक्षा से गीता को पढ़वाते।