आरटीआई के फंदे और सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णयों से बचने के लिए सरकार और सभी दलों की गलबहियां राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को रास नहीं आई हैं।
संघ ने इसे कर्तव्यों का खूंटा उखाड़कर स्वतंत्रता की आड़ में बिना किसी रोकटोक के आजादी हासिल करने जैसा करार दिया है।
संघ ने आरोप लगाया कि सभी दल जनआकांक्षाओं के विपरीत चुनाव सुधारों को रौंदने के लिए एक हो गए हैं। संघ ने सवाल उठाया है कि आरटीआई कानून जिसे जनता के लिए वरदान बताया जा रहा है, वह राजनीतिक दलों के लिए अभिशाप कैसे बन सकता है?
इसके साथ ही संघ ने अपराधियों के राजनीति में प्रवेश को बंद कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की प्रशंसा की है। इस मामले में भी संघ ने पूछा है कि आखिर वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था खुद ही इस दिशा में पहल क्यों नहीं करती?
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उल्लेखनीय है कि बीते दिनों कैबिनेट ने आरटीआई के फंदे से बचने के लिए जहां संविधान संशोधन के प्रस्ताव को मंजूरी दी है, वहीं सुप्रीम कोर्ट के हिरासत में होने या निचली अदालत से भी दो साल की सजा मिलने पर संसद-विधानसभा की सदस्यता छिन जाने संबंधी फैसले को पलटने के लिए विधेयक लाने पर सरकार ने सहमति दी है।
संघ के मुखपत्र पांचजन्य में इस मुद्दे पर सभी दलों की दिखाई गई एकजुटता पर करारा प्रहार किया गया है। संपादकीय में कहा गया है कि वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में जनआकांक्षाओं और चुनाव सुधारों को रौंदने के लिए सभी दल एक हो गए हैं।
पार्टीलाइन टूट गई है और सभी दलों का चेहरा एक हो गया है। आरटीआई के फंदे से निकलने के लिए संविधान संशोधन प्रस्ताव पर कैबिनेट की मुहर और सभी दलों के एकजुट होने की भी संघ ने तीखी आलोचना करते हुए कहा कि वर्तमान समय में भारतीय राजनीति सबसे बुरे दौर से गुजर रही है।
संघ ने पूछा कि क्या आरटीआई के दायरे में लाए जाने या सुप्रीम कोर्ट का अपराधियों की राजनीति में घुसपैठ रोकने के लिए दिया गया फैसला गलत था, या फिर दलों की नीयत में ही खोट आ गई है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए संपादकीय में कहा गया है कि आखिर इस फैसले में गलत क्या था?
इस संपादकीय में इन फैसलों को पलटने के लिए सरकार और दलों की दलील को भी हास्यास्पद करार दिया गया है। जनप्रतिनिधित्व कानून और संसद की सर्वोच्चता का बहाना ओढ़ने वाले दलों को संघ ने याद दिलाया है कि जनप्रतिनिधियों के अधिकार कर्तव्यों और खूंटे से बंधे हुए हैं।
संघ ने पूछा है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का विरोध करने वाले जनप्रतिनिधि और दल अपनी ओर से प्रतिनिधियों की योग्यता की कसौटी क्यों नहीं तय करते, जबकि संविधान के अनुच्छेद 102 और 191 में संसद को यह जिम्मेदारी भरा अधिकार मिला है।
संघ ने कहा है कि महिला आरक्षण और समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दों पर बिखरने वालों दलों में इन फैसलों के खिलाफ आई एकजुटता बताती है कि सत्ता का रंगमंच धरातल पर खड़ी जनता के मुकाबले इतना ऊंचा हो गया है, जहां से जमीनी सच दिखाई नहीं देता।