एम्नेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वाच की रिपोर्टों के मुताबिक भारत में 2005 से 2009 के बीच सांप्रदायिक दंगों में प्रतिवर्ष 130 लोगों की मौत हुई थी। पिछले वर्ष अक्टूबर तक हमारे मुल्क में सांप्रदायिक तनाव की 561 वारदातें हुईं थीं।
विज्ञापन
केंद्रीय गृहराज्य मंत्री किरण रीजिजू ने संसद में बताया था कि 2014 में अक्टूबर तक सांप्रदायिक वारदातों में 90 लोग मारे गए। उत्तर प्रदेश में पिछले वर्ष सांप्रदायिक वारदातों में सर्वाधिक 25 मौतें हुईं।
एम्नेस्टी इंटरनेशनल, ह्यूमन राइट्स वाच और गृहमंत्रालय के ये आंकड़े कतई रोचक नहीं लग रहे होंगे। संभवतः अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इन्हें पढ़ा भी नहीं होगा। हालांकि गुरुवार को जब उनका यह संदेश सामने आया कि भारत में हाल के वर्षों में धार्मिक असहिष्णुता बढ़ी है और ये इतनी बढ़ी है कि अगर आज महात्मा गांधी होते तो उन्हें भी इससे धक्का लगता तो ऐसा लगा मानो उन्होंने भारत की दुखती रग पर हाथ रख दिया।
विज्ञापन
भारतीय होने के नाते हमें अमेरिकी राष्ट्रपति की नसीहत चुभ जाए, लेकिन एक कड़वी सच्चाई ये भी है कि पिछले कुछ वर्षों में कई ऐसी वारदातें हुई, जिन्हें महात्मा गांधी देखते तो संभवतः अनशन पर बैठ जाते। और उन वारदातों में राजनीतिक दलों की जैसी भूमिका रही, उससे शायद ये भी संभव है कि गांधी की कोई परवाह भी नहीं करते।
1984 दंगेः धरती के हिलने से गांधी की आत्मा भी हिल जाती
31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ही हत्या उन्हीं के सिख अंगरक्षकों ने कर दी। इंदिरा गांधी के बेटे राजीव गांधी ने उस समय कहा था कि बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिल जाती है। इंदिरा गांधी के हत्या के बाद देश में भयानक सिख विरोधी दंगों हुए थे। 31 अक्टूबर से 3 नवंबर के बीच लगभग 2800 सिखों को मौत के घाट उतार दिया गया था।
1984 का सिख विरोधी दंगा भारतीय राजनीति और आजाद भारत का संभवतः पहला ऐसा दंगा था, जिससे प्रयोजित करने का आरोप किसी राजनीतिक दल पर लगा। कांग्रेस और उसके नेताओं पर आरोप लगा कि उन्होंने सिखों के विरुद्घ दंगाइयों को भड़़काया। उन्हें दंगाइयों की भीड़ का नेतृत्व किया। कांग्रेस पर सरकार और मशीनरी का दुरुपयोग कर ऐसे नेताओं को बचाने का आरोप भी लगा।
2009 में 1984 दंगो के एक मामले की सुनवाई में दिल्ली हाईकोर्ट ने टिप्पणी की थी-'हम गर्व से कहते हैं कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और दिल्ली इसकी राजधानी। हालांकि 1984 के सिख दंगों और उस समय दिल्ली पुलिस और सरकारी मशीनरी की भूमिकाओं का जिक्र आते ही दुनिया भर में हमारा सिर शर्म से झुक जाता है।'
महात्मा गांधी ने 1984 का वह दंगा देखा होता या दिल्ली हाईकोर्ट की टिप्पणी पढ़ी होती तो क्या करते, आप बताइए।
1992 बाबरी ध्वंसः दंगों की आग पर सेंकी गई राजनीतिक रोटियां
राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की बिसात पर मंदिर और मस्जिद को मोहरा बनाने का प्रयोग भी हिंदुस्तान ने पहली बार देखा था।
1984 लोकसभा चुनावों में इंदिरा गांधी की मौत से उभरी सहानुभूति के कारण महज दो सीटों पर सिमटी भाजपा ने भारतीय जनमानस में जगह बनाने के लिए एक नया रास्ता चुना। रास्ता जनमानस की पीड़ाओं और जरूरतों से गुजरने के बजाय धार्मिक उन्माद से होकर गुजरता था। भारतीय जनता पार्टी ने हिंदुओं को संगठित करने के लिए बाबरी मस्जिद को मुद्दा बनाया।
अयोध्या में बनी 500 साल पुरानी मस्जिद को तोड़कर मंदिर बनाने की बात की गई। कहा गया कि जहां मस्जिद है, वहां 500 साल पहले मंदिर था। बाबर के सिपहसालार ने मंदिर को तोड़कर मस्जिद बना दिया। ऐसे राजनीतिक प्रयोग वाराणसी और मथुरा में करने की बात भी कही गई।
धार्मिक उन्माद के लिए संगठित की गई भीड़ को आंदोलन की शक्ल दी गई। बाबरी मस्जिद राम मंदिर आंदोलन की बलि चढ़ गई। उसके बाद हुए दंगों में लगभग 2000 लोग मारे गए। केवल मुंबई में ही 900 लोग दंगों की भेंट चढ़ा दिए गए। मुंबई के दंगों में शिवसेना की भूमिका संदिग्ध मानी गई।
राम मंदिर आंदोलन की लहर पर सवार होकर 1996 में भारतीय जनता पार्टी की ओर से देश के पहले प्रधानमंत्री बने अटल बिहारी वाजपेयी ने राम मंदिर आंदोलन को यज्ञ कहा था, अगर महात्मा गांधी होते तो धार्मिक उन्माद के उस आंदोलन को क्या कहते? आप बताइए।
गोधरा और गुजरात दंगेः सड़क पर तीन दिन तक दोड़ती रही मौत
अयोध्या से अहमदाबाद जा रही साबरमती एक्सप्रेस के डिब्बों में 27 फरवरी, 2002 को आग लग गई, 58 यात्री मारे गए। ये सभी यात्री कारसेवक थे, जो अयोध्या से लौट रहे थे। गोधरा की उस वारदात में बाद गुजरात की कई शहरों में मुस्लिम विरोधी दंगे भड़़क उठे।
तीन दिनों तक अहमदाबाद की सड़कों पर मौत का तांडव होता रहा। प्रशासन और पुलिस की भूमिका को लेकर बहुत सवाल उठे। मानवाधिकार संगठनों की कई रिपोर्टों में गुजरात की तत्कालिक सरकार और प्रशासन को लेकर सवाल उठाए गए। उस समय के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका भी संदिग्ध मानी गई।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने उस समय अपनी रिपोर्ट में कहा था कि दंगों के दौरान राज्य सरकार अपने लोगों की सुरक्षा करने में फेल रही और उसने उन अधिकारों की रक्षा भी नहीं कि जो संविधान में दिए गए हैं।
उस समय के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी नरेंद्र मोदी को राजधर्म निभाने की नसीहत दी थी। हालांकि बाद में सभी अदालतों ने नरेंद्र मोदी को दंगों के आरोपों से बरी कर दिया।
मुजफ्फरनगर दंगेः उत्तर प्रदेश का अब तक सबसे बड़ा दंगा
यूपी के मुजफ्फरनगर का दंगा पिछले कुछ सालों में गुजरात दंगों के बाद की सबसे बड़ी हिंसा था। दंगों से प्रभावित अब भी राहत शिविरों में रह रहे हैं। दंगों में 62 लोगों की मौत हुई थी।
2013 के अगस्त-सिंतबर महीने में हुए मुजफ्फरनगर दंगों की आग पश्चिमी उत्तर प्रदेश का ग्रामीण अंचल भी झुलस गया था। मुजफ्फरनगर दंगे सोशल मीडिया का भी भयानक दुरुपयोग दिखा था।
उन दंगों में में उत्तर प्रदेश की अखिलेश यादव सरकार द्वारा बरती गई लापरवाही के मामले की सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है। हालांकि ये ऐसा दंगा था, जिसमें प्रशासन की लापरवाही साफ देखी गई थी। मुजफ्फरनगर के कवाल में हुई छेड़खानी की वारदात धीरे-धीरे तनाव का कारण बनती गई, लेकिन प्रशासन ने मामले पर चुप्पी साधे रखी। मुजफ्फरनगर दंगा लोकसभा चुनावों में भी मुद्दा बना था।