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...तो क्या दुनिया भर से धर्म गायब हो जाएगा?

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नास्तिकता दुनियाभर में बढ़ रही है, तो क्या धार्मिक होना अतीत की बात हो जाएगी? इस सवाल का जवाब मुश्किल नहीं, बहुत-बहुत मुश्किल है। कैलिफ़ोर्निया में क्लेरमोंट के पिटज़र कॉलेज में सामाजिक विज्ञान के प्रोफ़ेसर फिल ज़करमैन कहते हैं, "इस समय दुनिया में पहले के मुक़ाबले नास्तिकों की संख्या बढ़ी है, और इंसानों में इनका प्रतिशत भी बढ़ा है।"
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यह तथ्य गैलप इंटरनेशनल के सर्वे में उभरकर सामने आया है। गैलप इंटरनेशनल के सर्वे में 57 देशों में 50,000 से अधिक लोगों को शामिल किया गया।

नास्तिकों की संख्या बढ़ी
सर्वे के मुताबिक़ 2005 से 2011 के दौरान धर्म को मानने वाले लोगों की तादाद 77 प्रतिशत से घटकर 68 प्रतिशत रह गई है, जबकि ख़ुद को नास्तिक बताने वालों को संख्या में तीन प्रतिशत का इज़ाफ़ा हुआ है। इस तरह दुनिया में नास्तिकों का आंकड़ा बढ़कर 13 प्रतिशत तक पहुँच गया है।

अगर नास्तिकों की संख्या में बढ़ोतरी का सिलसिला यूँ ही जारी रहा तो क्या किसी दिन धर्म पूरी तरह से ग़ायब हो जाएगा?

सुरक्षा का अहसास

धर्म का मुख्य आकर्षण है कि यह अनिश्चित दुनिया में सुरक्षा का अहसास दिलाता है। इसलिए हैरानी नहीं होनी चाहिए कि नास्तिकों की संख्या में सबसे अधिक बढ़ोतरी उन देशों में हुई है जो अपने नागरिकों को आर्थिक, राजनीतिक और अस्तित्व की अधिक सुरक्षा देते हैं।

जापान, कनाडा, ब्रिटेन, दक्षिण कोरिया, नीदरलैंड्स, चेक गणराज्य, एस्तोनिया, जर्मनी, फ्रांस, उरुग्वे ऐसे देश हैं जहाँ 100 साल पहले तक धर्म महत्वपूर्ण हुआ करता था, लेकिन अब इन देशों में ईश्वर को मानने वालों की दर सबसे कम है। इन देशों में शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था काफ़ी मज़बूत है। असमानता कम है और लोग अपेक्षाकृत अधिक धनवान हैं।

न्यूज़ीलैंड की ऑकलैंड यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक क़्वेंटिन एटकिंसन कहते हैं, "असल में, लोगों में इस बात का डर कम हुआ है कि उन पर क्या बीत सकती है।" लेकिन धर्म में आस्था उन समाजों और देशों में भी घटी है जिनमें ख़ासे धार्मिक लोग हैं जैसे- ब्राज़ील, जमैका और आयरलैंड।

प्रोफ़ेसर फिल ज़करमैन कहते हैं, "दुनिया में बहुत कम समाज हैं जहाँ पिछले 40-50 साल के मुक़ाबले में धर्म में आस्था बढ़ी है। एक अपवाद ईरान हो सकता है लेकिन सही से आंकना मुश्किल है क्योंकि धर्मनिरपेक्ष लोग अपने विचार छिपा भी रहे हो सकते हैं।''

वैंकुवर स्थित ब्रिटिश कोलंबिया यूनिवर्सिटी के सामाजिक मनोविज्ञानी एरा नोरेनज़ायन कहते हैं, "धर्म के प्रति आस्था में कमी का मतलब इसका ग़ायब हो जाना नहीं है।"

दुख बढ़ेगा

आने वाले वर्षों में जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन का संकट गहराएगा और प्राकृतिक संसाधनों में कमी आएगी, पीड़ितों की संख्या बढ़ेगी और धार्मिक भावना में इज़ाफ़ा हो सकता है। नोरेनज़ायन कहते हैं, "लोग दुख से बचना चाहते हैं, लेकिन यदि वे इससे बाहर नहीं निकल पाते तो वे इसका अर्थ खोजना चाहते हैं। कुछ कारणों से धर्म, पीड़ा को अर्थ देने लगता है।"

वे कहते हैं कि यदि दुनिया की परेशानियां चमत्कारिक ढंग से हल हो जाएं और हम सभी शांतिपूर्ण तरीक़े से समान जीवन जीएं, तब भी धर्म हमारे आस-पास रहेगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि मानव विकास के दौरान हमारे दिमाग में ईश्वर के बारे में जिज्ञासा हमारी प्रजाति के तंत्रिका तंत्र में बनी रहती है।

दोहरी व्यवस्था
इसे जानने के लिए दोहरी प्रक्रिया सिद्धांत को समझने की ज़रूरत है। यह मनोवैज्ञानिक विषय बताता है कि बुनियादी रूप से हमारे दो विचार सिस्टम हैं। सिस्टम एक और सिस्टम दो। सिस्टम दो हाल ही में विकसित हुआ है। यह हमारे दिमाग़ की आवाज़ है- ये हमारे दिमाग़ में बार-बार गूँजती है और कभी चुप होती- जो हमें योजना बनाने और तार्किक रूप से सोचने को मजबूर करता है।

धर्म से छुटकारा

दूसरी तरफ़ सिस्टम एक, सहज, स्वाभाविक और ऑटोमैटिक है। ये क्षमताएं इंसानों में नियमित तौर पर विकसित होती रहती हैं, इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता कि इंसान कहां पैदा हुआ है।

वे अस्तित्व के तंत्र हैं। सिस्टम एक, बिना सोचे हमें बिना ज़्यादा प्रयास के अपनी मूल भाषा में बात करने देता है, बच्चों को माता-पिता की पहचान कराने और सजीव और निर्जीव वस्तुओं के बीच भेद करने की क्षमता देता है। यह दुनिया को बेहतर तरीक़े से समझने, प्राकृतिक आपदाओं या अपने क़रीबियों की मौत की घटनाओं को समझने में मदद करता है।

धर्म से छुटकारा
नास्तिकों को नास्तिक बनने या बने रहने के लिए अनेक सांस्कृतिक और मानव विकास से जुड़े बंधनों के ख़िलाफ़ लड़ना पड़ता है। इंसान स्वाभाविक तौर पर ये मानना चाहते हैं कि वो किसी बड़ी तस्वीर का हिस्सा है और जीवन पूरी तरह से निरर्थक नहीं है। हमारा मन, उद्देश्य और स्पष्टीकरण के लिए लालायित रहता है।

'बौर्न बीलीवर्स' के लेखक जस्टिन बैरेट कहते हैं, "इस बात के प्रमाण हैं कि धार्मिक विचारों को अपनाना मनुष्य के लिए - पाथ ऑफ़ लीस्ट रज़िज़टेंस - यानी सबसे कम प्रतिरोध का रास्ता होता है। धर्म से छुटकारा पाने के लिए आपको मानवता में शायद कुछ मूलभूत बदलाव करने होंगे।"

ईश्वर के प्रति आस्था की बात करें तो हालाँकि 20 प्रतिशत अमरीकी किसी चर्च से संबद्ध नहीं थे, लेकिन उनमें से 68 प्रतिशत ने माना कि उनका ईश्वर में विश्वास है और 37 प्रतिशत ने ख़ुद को धार्मिक बताया।

इसी तरह, दुनियाभर में उन लोगों ने जिन्होंने स्पष्ट कहा कि उनका ईश्वर में यक़ीन नहीं है, उनमें भी भूतों, ज्योतिष, कर्म, टेलीपैथी, पुनर्जन्म जैसे अंधविश्वासों की प्रवृत्ति पाई गई। धर्म, समूह सामंजस्य और सहयोग को बढ़ावा देता है। कथित लक्ष्मण रेखा को पार करने वालों पर सर्वशक्तिमान ईश्वर की नज़र पुराने समाज को व्यवस्थित रखने में मदद करती थी।

एटकिंसन कहते हैं, "यह अलौकिक सज़ा परिकल्पना है। यदि हर कोई मानेगा कि सज़ा वास्तव में होगी तो यह पूरे समूह के लिए काम करेगी।"
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अटूट विश्वास

अंत में, धर्म की आदत के पीछे कुछ गणित भी है। तमाम संस्कृतियों में जो लोग ज़्यादा धार्मिक हैं वे उन लोगों के मुक़ाबले ज़्यादा बच्चे पैदा करते हैं जिनकी धर्म के प्रति आस्था नहीं है।

विशेषज्ञों का मानना है कि मनोवैज्ञानिक, तंत्रिका विज्ञान, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और तार्किक, इन सभी कारणों को देखते हुए धर्म शायद कभी इंसानों से दूर नहीं जा सकेगा। धर्म, चाहे इसे डर या प्यार से बनाए रखा गया हो- खुद को बनाए रखने में अत्यधिक सफल रहा है। अगर ऐसा नहीं होता तो यह शायद हमारे साथ नहीं होता।

अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है।

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