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दंगे में मरने वाले बंगाली मुसलमान तो कभी आदिवासी?

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इस बार यहां कोई क्रिसमस नहीं मना सका। हालांकि क्रिसमस से पहले ही पाखरीगुड़ी गांव के लोगों ने घरों पर मिट्टी का ताजा लेप लगाया था।
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असम-पश्चिम बंगाल सीमा पर स्थित बारोबीशा में राष्ट्रीय राजमार्ग से सटे मैंने ऐसे सैकड़ों घरों और स्कूलों को देखा। वो क्रिसमस मनाते भी कैसे?

13 साल का सोमाइ मुर्मु और उसकी 18 साल की भाभी के खून के धब्बे उनके घर के बाहर अब भी ताजा हैं। ये जगह बांस के उस खंबे से बस दो मीटर दूर है, जो क्रिसमस स्टार के लिए लगाया गया था।

चार्ल्स मूर्मू के घर पर गोलियों के निशान अब भी मौजूद

चार्ल्स मूर्मू के घर पर मैंने गोलियों के अनगिनत निशान देखे। उनकी बहू एनिस्थिया और उसका तीन साल का बेटा बुनिपास गोलियों से घायल हो गए थे और अब भी मौत से जंग लड़ रहे हैं।

चार्ल्स के घर के ठीक सामने सोम हंसदा का मकान है। हंसदा चरमपंथी हमले में मारे गए अपने परिजनों के लिए चावल से भरी थाली किचन में रखते हैं और फिर कुछ कपड़े समेटकर फटाफट राहत शिविर की तरफ भागते हैं।

हंसदा के बेटे स्टीफन चरमपंथियों की गोलियों से बचने के लिए किचन की तरफ भागे थे, लेकिन स्टीफन और उनकी मां की गोलियां लगने से मौत हो गई। हंसदा ने गड्ढे में कूदकर किसी तरह अपनी जान बचाई।

बोडो उग्रवादियों ने किया था कई गांवों में हमला

नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड के संदिग्ध चरमपंथियों ने 23 दिसंबर को कोकराझार और सोनितपुर जिलों में कई गांवों में हमले किए थे और लगभग 70 आदिवासियों की हत्या कर दी थी। जवाबी कार्रवाई में 16 बोडो चरमपंथी भी मारे गए थे।

कोकराझार जिला बोडोलैंड स्वायत्तशासी क्षेत्र में पड़ता है। इस इलाक़े को बोडो आदिवासी प्रशासित करते हैं। खास बात यह है कि इस क्षेत्र में 70 प्रतिशत आबादी गैर-बोडो लोगों की है, जिसमें बड़ी संख्या में आदिवासी और बंगाली बोलने वाले मुसलमान भी शामिल हैं।

ब्रितानी शासन में संथाल विद्रोह के बाद आदिवासियों को यहां मध्य भारत से लाया गया था। वे अधिकतर ईसाई थे। रोचक तथ्य यह है कि असम के आदिवासी 'अनुसूचित जनजाति' में शामिल नहीं हैं, जबकि मध्य भारत में रह रहे उनके परिवार अनुसूचित जनजाति में शामिल हैं।

आखिर यहां दंगे रूकते क्यों नहीं?

असम में दंगों की रिपोर्टिंग करते हुए मैं लोगों से पूछता रहता था कि ये दंगे आखिर रुकते क्यों नहीं? क्यों कभी मरने वाले बंगाली मुसलमान होते हैं तो कभी आदिवासी?

जिस किसी से भी मैंने ये सवाल पूछे, एक बोडो नेता को छोड़, लगभग सभी का जवाब था कि अल्पसंख्यक होने के बावजूद बोडो अपना राजनीतिक वर्चस्व बनाए रखना चाहते हैं।

इस क्षेत्र में आतंकवाद रोकने के लिए जब बोडोलैंड समझौता हुआ था, तो परिषद का गठन इस तरह किया गया कि बोडो लोगों का वर्चस्व बना रहे।
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बोडोलैंड समझौते पर दोबारा विचार की जरूरत

कई सांसदों, शोधकर्ताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि इस समझौते पर फिर से विचार करने की जरूरत है।

फिलहाल तत्काल शांति के लिए लोग चाहते हैं कि बोडो नेताओं समेत जिन चरमपंथियों ने आत्मसमर्पण कर दिया है, उनके हथियार ज़ब्त किए जाने चाहिए।

शायद यही हमें असम में हिंसा से जुड़ी खबरों को कवर करने के लिए आने से रोक सकता है।
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