हवा में रहेगी मेरे ख्याल की खुशबू, ये मुश्ते-खाक फानी है, रहे, रहे न रहे। ये शेर उसी गजल का आखिरी शेर है भगत सिंह ने अपने छोटे भाई कुलतार सिंह को लिखे पत्र में लिखा था।
पत्र फांसी से 20 दिन पूर्व तीन मार्च 1931 को लिखा गया था। लेकिन इस शेर की पहली पंक्ति हकीकत न बन सकी। आजादी के 65 साल बाद भगत सिंह को याद करने वाले कुछ चुनिंदा नाम हैं।
कुछ चुनिंदा चेहरे हैं, लेकिन इतने भर से उनके चाहने वाले मायूस नहीं है। वो हर लम्हा शहीद-ए-आजम भगत सिंह के विचारों को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं।
चंदौसी के सेवानिवृत्त शिक्षक और चित्रकार विनोद कुमार दत्ता भगत सिंह के लिखे उन पत्रों को संजोकर लोगों के सामने लाएं हैं जो उन्होंने जेल में लिखे थे।
भगत सिंह ने जेल जाने और फांसी मिलने के बीच कोई 20 से अधिक पत्र लिखे हैं। उन पत्रों में उन्होंने देश के सामने समस्या, उनका निदान और भारत का भविष्य इन सभी बिंदुओं पर ध्यान दिलाया है।
दत्ता ने पत्रों को एक कॉमिक्स साइज बुक का रूप दिया है। इससे पहले वह भगत सिंह के जीवन से जुड़े प्रसंगों पर दस से अधिक कॉमिक्स साइज बुक की सीरिज निकाल चुके हैं।
भगत सिंह के भांजे प्रोफेसर जगमोहन सिंह के बनाए शहीद भगत सिंह शताब्दी फाउंडेशन से दत्ता जुड़े हुए हैं। उनका कहना है कि भारत में महात्मा गांधी से ज्यादा किसी को नहीं पढ़ाया गया।
यदि भगत सिंह को भी पाठ्यक्रम में उतना ही स्थान मिले तो देश के युवाओं को नई स्फूर्ति के साथ भारतीयता के लिए दर्शन मिलेगा।
सपना जो अधूरा रह गया...
साथियों,
स्वाभाविक है कि जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए, मैं इसे छुपाना नहीं चाहता। लेकिन मैं एक शर्त पर जिंदा रह सकता हूं, कि मैं कैद होकर या पाबंद होकर जीना नहीं चाहता।
मेरा नाम हिंदुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है। ... दिलेराना ढंग से हंसते -हंसते मेरे फांसी पर चढ़ने की सूरत में हिंदुस्तानी माताएं अपने बच्चों के भगत सिंह बनने की आरजू किया करेंगी और देश की आजादी के लिए कुर्बानी देने वालों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी कि उस क्रांति को रोकना साम्राज्यवाद या तमाम शैतानी शक्तियों के बूते की बात नहीं रहेगी।
आपका साथी
भगत सिंह
(22 मार्च 1931 को लिखे भगत सिंह के आखिरी पत्र का अंश)