एक ओर तिहाड़ जेल की अन्य बैरकों में मौजूद कैदी रविवार रात शिवरात्रि के रंग में रंगे थे। वहीं, रामसिंह अपनी बैरक में ‘फांसी’ का तानाबाना बुन रहा था।
बताया जा रहा है कि तिहाड़ आने के बाद उसके साथ कई बार मारपीट हो चुकी थी। वह मान बैठा था कि उसे फांसी होनी ही है। इन तमाम वजहों से उसने खुद ही मौत को गले लगाना ज्यादा मुफीद समझा।
खुद की फांसी के लिए फंदा भी उसने अपने हाथ से ही तैयार किया। इसके लिए प्लास्टिक की रस्सी (डिब्बों की पैकिंग में इस्तेमाल होने वाली करीब तीन फीट लंबी टेप सरीखी प्लास्टिक) और दरी के धागों का इस्तेमाल किया गया।
रविवार देर रात तक तिहाड़ में कैदी शिवरात्रि के उल्लास में डूबे थे। बाल्टी व सुराही की ताल पर गीत गाते हुए कैदी झूम रहे थे, मगर राम सिंह इस दौरान अपनी बैरक के बरामदे में टहल रहा था। रात 12 बजे बाद भी उसे सुरक्षाकर्मियों ने टहलते देखा था।
सूत्रों का कहना है कि संभवत: उसी दौरान उसने फांसी के लिए फंदा तैयार किया होगा। फंदे के लिए उसने प्लास्टिक की तीन फुट लंबी रस्सी और दरी के धागों का इस्तेमाल किया।
सूत्रों के अनुसार, राम सिंह ने फांसी के लिए बरामदे में करकट को सहारा देने के लिए लगाई गई लोहे की रॉड का इस्तेमाल किया। रॉड की ऊंचाई अधिक होने की वजह से वहां तक पहुंचने के लिए उसने प्लास्टिक के बाल्टी का इस्तेमाल किया।
कसूरी वार्ड के पास सुरक्षाकर्मी तैनात होते हैं, लेकिन कर्मियों की कमी की वजह से वार्ड दो और तीन की सुरक्षा की जिम्मेदारी उन्हीं कर्मियों को दी गई थी। इसे सुरक्षा में एक बड़ी चूक माना जा रहा है।
बताया जाता है कि राम सिंह बैरक में बने सीमेंट के बेड पर सोता था, जबकि वहां बंद दो अन्य कैदी जमीन पर सोते थे। कुछ दिन पहले ही दोनों कैदी उस बैरक में आए थे, इसलिए उन्हें राम सिंह के रहन-सहन का ज्यादा अंदाजा नहीं था।
घटना के बाद पुलिस रिमांड खत्म होने पर राम सिंह को जेल संख्या-चार में रखा गया था, लेकिन साथी कैदियों की पिटाई के बाद उसे जेल संख्या-तीन में शिफ्ट कर दिया गया। हालांकि, अफजल गुरू की फांसी से पहले उसे वार्ड संख्या-एक से हटाकर दो में भेज दिया गया था।