दिल्ली गैंगरेप के आरोपी राम सिंह की आत्महत्या का मामला गरमा गया है। राम सिंह के पिता ने आरोप लगाया है उसने फांसी नहीं लगाई, बल्कि उसकी हत्या की गई है।
राम सिंह के वकील ने भी इस मामले में साजिश होने की आशंका जताई है। दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने इस मामले में कुछ भी कहने से इनकार कर दिया है।
सोशल मीडिया पर भी ये पूछा जा रहा है कि देश सर्वाधिक सुरक्षित तिहाड़ जेल में राम सिंह ने फांसी लगा ली और किसी को पता नहीं चला, अखिर ये कैसे हो सकता है?
तर्क 1: राम सिंह के हाथ में था फ्रैक्चर
राम सिंह की मौत के बाद उसके पिता ने आरोप लगाया कि राम सिंह की हत्या हुई है। उन्होंने मामले की सीबीआई जांच की मांग की है।
उन्होंने कहा, 'राम सिंह की हत्या करने के बाद उसे फांसी पर लटका दिया गया। उसने आत्महत्या नहीं की। उन्होंने कहा कि राम सिंह का एक हाथ फ्रैक्चर्ड था, ऐसे में वो खुद कैसे फांसी लगा सकता है?
उन्होंने बताया कि राम सिंह को पहले भी जेल में पीटा गया था। राम सिंह के पिता ने इस मामले की सीबीआई से जांच कराए जाने की मांग की।
तर्क 2: सुसाइड वाच पर था राम सिंह
राम सिंह को तिहाड़ जेल प्रशासन ने सुसाइड वाच पर रखा था। पीटीआई ने जेल सूत्रों के हवाले से बताया है कि जनवरी से ही राम सिंह समेत दिल्ली गैंगरेप के पांचों आरोपियों को सुसाइड वाच पर रखा गया था।
जनवरी में गैंगरेप मामले की सुनवाई शुरु होने के बाद उन्हें लगने लगा था कि उन्हें फांसी दे दी जाएगी। इसकी वजह से ये गुमसुम रहने लगे थे और एक दूसरे से बात करना भी बंद कर दिया था।
इसके बाद प्रशासन ने इनकी निगरानी शुरू कर दी थी और इन्हें सुसाइड वाच पर रख दिया था। राम सिंह की निगरानी के लिए एक गार्ड तैनात किया गया था। गार्ड 24 घंटे राम सिंह पर नजर रखता था।
रविवार-सोमवार की रात गार्ड को भी राम सिंह के फांसी लगाए जाने की भनक क्यों नहीं लगी, इसे लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।
तर्क 3: उसकी सेल में दूसरे कैदी भी थे
राम सिंह को तिहाड़ जेल की जिस सेल में रखा गया था, उसमें उसके साथ दूसरे कैदी भी थे। पिता के मुताबिक राम सिंह की सेल में दो कैदी बंद थे।
पीटीआई ने जेल सूत्रों के हवाले से बताया है कि राम सिंह ने जब फांसी लगाई, उसकी सेल में दूसरे कैदी भी थे। हालांकि ये स्पष्ट नहीं है कि राम सिंह की सेल में कितने कैदी बंद थे ?
ऐसे में ये सवाल उठ रहा है कि राम सिंह ने फांसी लगाई तो सेल में बंद दूसरे कैदियों को भनक क्यों नहीं लगी?