प्रधानमंत्री कार्यालय ने एक बार फिर सरकार में नंबर दो की हैसियत रखने वाले गृहमंत्री राजनाथ सिंह की सिफारिश खारिज कर दी।
गृहमंत्री के पसंदीदा नाम को दरकिनार करते हुए पीएमओ ने संयुक्त खुफिया कमेटी (जेआईसी) के मुखिया आरएन रवि को नगा शांति वार्ता के लिए नया वार्ताकार नियुक्त किया, जबकि गृहमंत्रालय ने हाल ही में रिटायर होने वाले अजित लाल का नाम बढ़ाया था।
इससे पहले भी पीएमओ के हस्तक्षेप की वजह से ही राजनाथ अपनी पसंद के आईपीएस अधिकारी को निजी सचिव नहीं बनवा पाए थे। इस निर्णय को सार्वजनिक तौर पर गृहमंत्री का कद बढ़ाने और अंदरखाने पर कतरने के रूप में देखा जा रहा है।
दो गुट हैं भारतीय जनता पार्टी में?
शुक्रवार को पहले प्रधानमंत्री के जापान दौरे की अवधि में गृहमंत्री राजनाथ को नंबर दो का ओहदा मिलने की खबर आई, वहीं यह भी खबर आई कि नगा शांति वार्ता के लिए वार्ताकार नियुक्त करने संबंधी गृहमंत्रालय की सिफारिश पीएमओ ने ठुकरा दी है।
गृहमंत्रालय ने जुलाई 2014 में जेआईसी के प्रमुख पद से रिटायर हुए अजित लाल के नाम की सिफारिश की थी लेकिन पीएमओ ने वर्तमान जेआईसी रवि को नगा शांति वार्ताकार नियुक्त कर दिया। इसकी वजह रवि की पूर्वोत्तर के मामलों में विशेषज्ञता को माना जा रहा है।
पार्टी सूत्रों का कहना है कि दरअसल सरकार के साथ-साथ पार्टी के अंदर दो गुट आमने सामने हैं। राजनाथ समर्थकों को लगता है कि सरकार और पार्टी से अटल, आडवाणी, जोशी का अध्याय खत्म होने के बाद गृहमंत्री एक गुट विशेष के निशाने पर हैं।
हो रहा राजनाथ का कद घटाने का प्रयास?
राजनाथ समर्थकों का मानना है कि चूंकि सरकार और पार्टी में उस विशेष गुट के इतर अब महज राजनाथ ही अकेले शख्स बचे हैं जिनकी संघ के साथ-साथ पार्टी के एक वर्ग में पैठ है। इसलिए दूसरा गुट उनका कद घटाने का प्रयास कर रहा है।
समर्थक गुट इस क्रम में गृहमंत्री और उनके पुत्र पंकज सिंह के खिलाफ अफवाहों का बाजार गर्म करने के मामले में विरोधी गुट की ही चाल देखते हैं। बहरहाल पहले से ही कई तरह की चर्चाएं झेल रही पार्टी और सरकार में अब प्रधानमंत्री के इन दो निर्णयों पर भी नए सिरे से चर्चाओं का बाजार गर्म है।
राजनाथ समर्थकों का कहना है कि भले ही गृहमंत्री की सिफारिश नहीं मानी गई लेकिन नया नाम प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के बीच हुए विचार विमर्श के बाद ही तय हुआ। समर्थकों का कहना है कि अजित लाल को वार्ताकार नियुक्त करने में दो दिक्कतें आईं। पहला वह यूपीए कार्यकाल में भी वार्ताकार थे और दूसरा अगर उन्हें वार्ताकार बनाया जाता तो उनका दूसरा सेवा विस्तार होता।