राजस्थान की भाजपा सरकार यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रोबर्ट वाड्रा की जमीनों का पता करने के बाद आगे की कार्यवाही शायद भूल चुकी है।
गत जनवरी में बीकानेर कलक्टर ने अपनी रिपोर्ट में खुलासा किया था कि सोलर हब परियोजना की घोषणा होने से पहले वाड्रा ने अपनी विभिन्न कम्पनियों के मार्फत किसानों से औंने-पौने दामों पर करीब 2500 बीघा जमीन खरीदी।
इन जमीनों को परियोजना की घोषणा होने के बाद कई गुना महंगे दामों में बेचा और किसान ठगे रह गए। राजस्थान की पिछली कांग्रेस सरकार में हुए इस मामले को लेकर आई कलक्टर की रिपोर्ट के बाद जांच आगे नहीं बढ़ी है।
जानकारी के अनुसार करीब तीन महीने पहले राजस्थान विधानसभा में एक सवाल पर राजस्थान सरकार ने वाड्रा की जमीन खरीद मामले में जांच आगे बढ़ाने को कहा था, लेकिन अब तक कुछ नहीं हुआ है।
मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने विधानसभा और लोकसभा चुनाव में वाड्रा पर किसानों से ठगी करने का आरोप लगाकर जांच में दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने को कहा था।
ये है रिपोर्ट में
रिपोर्ट के अनुसार राबर्ट वाड्रा की रियल स्टेट बिजनेस से जुड़ी कम्पनियों मैसर्स स्काई लाइट रियलिटी प्राइवेट लिमिटेड, नॉर्थ इंडिया आईटी पाक्र्स प्राइवेट लिमिटेड, ब्लू ब्रीज ट्रेडिंग प्राइवेट लिमिटेड, स्काई लाइट हॉस्पिटेलिटी प्राइवेट लिमिटेड तथा रीयल अर्थ एस्टेट प्राइवेट लिमिटेड में भागीदारी है। इन कम्पनियों के जरिए बीकानेर जिले में 2503 बीघा (633 हेक्टेयर) जमीन किसानों से खरीदी।
परियोजना भी पीछे ढकेली
केन्द्र की योजना के अनुसार राजस्थान में कांग्रेस की गहलोत सरकार को सौर ऊर्जा हब के तहत लैण्ड बैंक स्थापित करना था और प्लांट स्थापित करने वाले निवेशकों को भूमि डीएलसी दर के मुकाबले मात्र 10 प्रतिशत पर ही देनी थी।
वर्ष 2008 की शुरूआत में नवीन एवं नवीनीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय ने राजस्थान सरकार को पॉलिसी जारी करने को कहा था, लेकिन गहलोत सरकार ने करीब तीन साल तक इस संबंध मे कोई पॉलिसी जारी नहीं की। इन सालों में वाड्रा ने किसानों से कौडिय़ों के दामों में जमीन खरीदकर खुद का लैंड बैंक तैयार कर लिया था।
जब सरकार ने रियायती जमीनें देने के नाम पर कम्पनियों के आगे हाथ खड़े कर दिए, तब कम्पनियों को प्लांट लगाने के लिए मजबूरी में वाड्रा से महंगी जमीनें खरीदनी पड़ीं। पॉवर प्लांट स्थापित करने में निवेशको को दिक्कत आई और प्लांट स्थापित करने की गति पर भी ब्रेक भी लगा।
कागजात भी गैर कानूनी
खरीद-फरोख्त के कागजातों में एक ऐसी पॉवर ऑफ अटर्नी भी देखने को मिल रही है, जिस पर न तो नोटरी के दस्तखत हैं और न ही स्टॉम्प। इस कागज की कानून की नजर में मान्यता शून्य से अधिक नहीं, लेकिन इसके आधार पर सरकारी मशीनरी ने रजिस्ट्री तक कर डाली।
कम्पनी----------------------जमीन खरीदी--------जमीन बेची
स्काई लाइट रियलिटी प्रा.लि.-------541 बीघा-------248 बीघा
नॉर्थ इंडिया आईटी पाक्र्स प्रा.लि.--------525 बीघा-------260 बीघा
ब्लू ब्रीज ट्रेडिंग प्रा.लि.------499 बीघा------266 बीघा
स्काई लाइट हॉस्पिटेलिटी प्रा.लि.-----555 बीघा-----245 बीघा
रीयल अर्थ एस्टेट प्रा.लि.------382 बीघा-----104 बीघा
किसानों को ठगकर की मोटी कमाई
वाड्रा ने महेश नागर, औंकार यादव, अशोक कु मार, देव राज, सुरेन्द्र सिंह, प्रदीप यादव को पॉवर ऑफ एटोर्नी देकर जमीनें खरीदने के लिए अधिकृत किया एवं इन लोगों ने विभिन्न कम्पनियों के माध्यम से बीकानेर जिले में जमीनें खरीदीं। जमीन खरीद-फरोक्त के कुछ उदाहरण...
किसने बची---- किसे बेची------------तारीख-----खरीदी-----बेची-------मुनाफा
महेश नागर-----ब्रिजेश गोरसिया-----19 फरवरी 2010-----37,39,086-----96,60,000-----59,20,914
महेश नागर-----अशोक कुमार-----16 जुलाई 2010-----30,00,000-----58,85,000-----28,85,000
महेश नागर-----अशोक कुमार-----04 जनवरी 2010-----30,00,000-----58,85,000-----28,85,000
महेश नागर-----सुरेन्द्र सिंह-----20 जुलाई 2010-----3,00,000-----17,04,300-----14,04,300
महेश नागर-----सतीश कुमार-----17 अक्टूबर 2011-----42,00,000-----59,23,500-----17,23,500
महेश नागर-----सतीश कुमार-----04 जनवरी 2010-----42,00,000-----59,23,500-----17,23,500