अपने पिता राजीव गांधी के हत्यारों की माफी पर अभी तक चुप्पी साधे हुए राहुल गांधी ने पहली बार कोई प्रतिक्रिया दी है।
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा, 'मैंने आज ही कातिलों की रिहाई की खबर सुनी है। मैं सजा-ए-मौत के खिलाफ हूं। इस देश में जब प्रधानमंत्री को इंसाफ नहीं मिलता है तो फिर आम आदमी को कैसे मिलेगा?'
अमेठी में एक सभा को संबोधित करते हुए राहुल ने कहा कि वह अपने पिता के हत्यारों को फांसी देने के पक्ष में कभी नहीं थे। लेकिन, उन्हें रिहा भी नहीं किया जाना चाहिए था।
न्यायिक व्यवस्था पर भी सवाल
राहुल ने तमिलनाडु सरकार के फैसले पर निराशा जताते हुए कहा, 'मैं दुखी हूं कि हत्यारों को रिहा किया जा रहा है। मेरे पिता ने अपना हर वक्त जनता की सेवा करने में ही लगाया था।'
राहुल ने हत्यारों की रिहाई के फैसले को लेकर न्यायिक व्यवस्था पर भी निशाना साधा।
उन्होंने कहा कि जब देश के प्रधानमंत्री, जिन्होंने राष्ट्रहित में अपना बलिदान दे दिया, उन्हें न्याय नहीं मिल सकता तो फिर आम आदमी को कैसे न्याय मिलेगा।
राहुल ने भावुक भाषण देते हुए कहा, 'मैं फांसी की सजा के पक्ष में कभी नहीं था। ऐसी सजा से मेरे पिता लौट कर नहीं आते, लेकिन यह मामला केवल मेरे पिता और परिवार का नहीं है। यह पूरे देश का मामला है।'
जयललिता की सियासी चाल
इससे पहले उच्चतम न्यायालय से फांसी की सजा पर माफी मिलने के जयललिता सरकार ने राजीव गांधी के सभी सातों हत्यारों की जेल से रिहाई की घोषणा कर दी।
कैबिनेट से इसकी मंजूरी मिल चुकी है और अब राजीव के हत्यारे सांतन, मुरुगन, पेरारिवलन, नलिनी व तीन अन्य को जल्द ही जेल से रिहा कर दिया जाएगा। ये सभी आरोपी जेल में 14 साल की सजा काट चुके हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने तीन दोषियों सांतन, मुरुगन, पेरारिवलन की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया था। नलिनी की फांसी की सजा को पहले ही उम्रकैद में बदल दिया गया था।
अदालत ने फांसी को उम्रकैद में बदला
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस पी सदाशिवम, जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस एनवी रमन की पीठ ने तीनों दोषियों टी सुतेन्द्र राजा उर्फ संतम, वी श्रीहरन उर्फ मुरूगन और एजी पेरारिवलन उर्फ अरीवू की फांसी की सजा को बुधवार को उम्रकैद में तब्दील कर दिया था।
अदालत ने दया याचिकाओं के निपटारे में अनावश्यक देरी को अपने इस फैसले का आधार बनाया। चीफ जस्टिस पी सदाशिवम ने कहा कि कार्यपालिका का यह कर्तव्य है कि वह निश्चित समय के भीतर अपने अधिकारों का इस्तेमाल करे, चाहे फैसला किसी के पक्ष में हो।
सर्वोच्च अदालत ने सरकार से अपील भी कि वह भविष्य में दया याचिकाओं के त्वरित निपटारे के लिए राष्ट्रपति को उचित सलाह दे।