कांग्रेस में चल रहे सोनिया राहुल के वफादारों केबीच चल रहे आंतरिक सत्ता संघर्ष में आखिरकार टीम राहुल आगे निकलती दिख रही है। हाल ही में बनाए गए पार्टी के प्रदेश अध्यक्षों में जिस तरह राहुल गांधी की ही चली है, उससे साफ संकेत हैं कि कांग्रेस में सोनिया गांधी के जमाने में सत्ता के केंद्र रहे नेताओं को दरकिनार करने का सिलसिला शुरु हो गया है।
राहुल हालाकि अभी अज्ञातवास में हैं लेकिन उनकी गैर मौजूदगी में जिन पांच प्रदेश अध्यक्षों को बदलकर जो नए चेहरे आगे लाए गए हैं, वह सभी टीम राहुल के ही माने जाते हैं। दिल्ली प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाए गए अजय माकन पूरी तरह राहुल गांधी के विश्वासपात्र हैं।
सूत्रों के मुताबिक माकन कांग्रेस में होने वाले संभावित फेरबदल में राहुल केराजनीतिक सलाहकार की भूमिका में आना चाहते थे, लेकिन राहुल ने उन्हें पांच साल तक दिल्ली में भाजपा और आम आदमी पार्टी की चुनौती का मुकाबला करते हुए कांग्रेस को फिर से खड़ा करने की जिम्मेदारी दी है।
करारी हार के बाद भी माकन बने दिल्ली के अध्यक्ष
सांसद बनने के बाद से ही माकन राहुल के करीब आ गए थे। राहुल ने ही उन्हें पहले केंद्रीय मंत्री, फिर महासचिव और मीडिया विभाग का प्रभारी बनाया। हाल ही में हुए दिल्ली विधानसभा चुनावों में माकन को राहुल के ही जोर पर चुनाव प्रचार अभियान का अध्यक्ष बनाकर चुनाव में कांग्रेस केचेहरे केरूप में पेश किया गया।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जनार्दन द्विवेदी के मोदी की तारीफ वाले कथित बयान को लेकर जब विवाद उठा तो माकन ने जिस तरह की कड़ी भाषा का इस्तेमाल किया, वह बिना राहुल की सरपरस्ती के मुमकिन नहीं था।
महाराष्ट्र के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाए गए पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चह्वाण को मुंबई पर आतंकवादी हमले के बाद विलासराव देशमुख की जगह राहुल गांधी के कहने पर ही मुख्यमंत्री बनाया गया।
महाराष्ट्र में भी चली टीम राहुल की
उसके बाद विलासराव के सरपरस्त और दस जनपथ के करीबी कांग्रेस का सत्ता केंद्र माने जाने वाले एक नेता ने चह्वाण को अस्थिर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बाद में आदर्श घोटाले में अशोक चह्वाण पर आरोप लगने के बाद उसी नेता ने दबाव बनाकर उन्हें हटवाया और पृथ्वीराज चह्वाण को मुख्यमंत्री बनवाया।
इसे एक तरह से राहुल खेमे की हार के रूप में पार्टी के भीतर देखा गया था। अब फिर अशोक चह्वाण की प्रदेश अध्यक्ष पद पर ताजपोशी उक्त नेता के लिए झटका और राहुल की सत्ता का मजबूत होने का संकेत है।
गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री माधवराव सोलंकी के बेटे और पूर्व केंद्रीय मंत्री भरत सिंह सोलंकी को गुजरात प्रदेश कांग्रेस की कमान सौंपी गई है। भरत सोलंकी पहले भी गुजरात कांग्रेस की कमान संभाल चुके हैं।
जेएंडके और गुजरात में भी रहा राहुल का दबदबा
उन्हें पार्टी के वरिष्ठ नेता शंकर सिंह वाघेला का करीबी माना जाता है। माना जाता है कि पार्टी का सत्ता केंद्र माने जाने वाले एक बड़े नेता के साथ इन दोनों की कभी नहीं बनी। अब वाघेला विधानसभा में नेता विपक्ष हैं और सोलंकी प्रदेश अध्यक्ष।
यह भी राहुल के दबदबे का संकेत है। इसी तरह मुंबई प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष संजय निरुपम को भी राहुल के करीबी होने का फायदा मिला है। निरुपम भी टीम राहुल के नेताओं के बेहद करीब माने जाते हैं।
जबकि जम्मू कश्मीर कांग्रेस अध्यक्ष बनाए गए गुलाम अहमद मीर को भी सोनिया गांधी और राहुल गांधी का पुराना वफादार माना जाता है। गुलाम नबी आजाद की सरकार के दौरान एक यौन कांड में फंसने के बाद मीर को पार्टी ने दरकिनार कर दिया था।
बाद में अदालत ने उन्हें जब बेदाग करार दिया तो राहुल के दबाव ने ही मीर को आजाद सरकार में मंत्री बनवाया था। सोनिया और राहुल के चुनावों में मीर रायबरेली और अमेठी भी जाते रहे हैं। तेलंगाना के प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए उत्तम रेड्डी को भी टीम राहुल का ही माना जा रहा है।