फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

चिंतन शिविर की चिंता, राहुल कैसे बनेंगे प्रधानमंत्री?

Fri, 18 Jan 2013 02:42 PM IST
चंदन जायसवाल
विज्ञापन
विज्ञापन
गुलाबी नगरी जयपुर में आज से कांग्रेस का दो दिवसीय चिंतन शिविर पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी के संबोधन के साथ शुरू हो गया। इस चिंतन शिविर की सबसे बड़ी चिंता यह होगी कि कांग्रेस के युवराज को 'देश का युवराज' कैसे बनाएं?
विज्ञापन


जानकारों के मुताबिक कांग्रेस अपने लगातार प्रयास के बावजूद राहुल गांधी की छवि को राष्ट्रीय स्तर के नेता के तौर पर नहीं गढ़ पा रही है। प्रतिदिन राहुल का घटता प्रभाव और प्रधानमंत्री पद की धूमिल होती दावेदारी इस समय कांग्रेस की सबसे बड़ी चिंता बनी हुई है।

सूत्रों के मुताबिक इस चिंतन शिविर में गुजरात चुनाव के बाद बदले राजनीतिक समीकरण, नरेंद्र मोदी से मिलने वाली चुनौती, भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी यूपीए-2 सरकार की छवि, बढ़ती महंगाई, युवा वोटरों की अहमियत और पार्टी की छवि बदलने की कोशिश के अलावा ‘राहुल गांधी को प्रधानमंत्री कैसे बनाएं’ पर चिंतन, मनन और मंथन होगा।
विज्ञापन


दरअसल, अन्ना आंदोलन और दिल्ली गैंगरेप मामले में राजधानी से लेकर देश के कोने-कोने में जिस तरह युवाओं का गुस्सा सड़कों पर उमड़ा, उसने कांग्रेस आलाकमान समेत देश के सियायतदानों को हिला कर रख दिया। इस समय कांग्रेस की कोशिश नए वोटरों को रिझाने और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर युवाओं की नाराजगी साधने की है।

कांग्रेस ने इस समय राहुल गांधी को देश के सामने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में प्रस्तुत किया है। यहां तक की कांग्रेस ने राहुल की राह आसान करने के लिए वरिष्ठ नेता प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति पद पर आसीन करा दिया। राहुल युवा भी हैं और उनमें उनके पिता राजीव गांधी का अक्स भी दिखाई देता है, लेकिन पिछले तीन वर्षों का इतिहास देखें तो पता चलता है कि कांग्रेस को सबसे ज्यादा चिंता केवल इसी बात की है कि दिन-प्रतिदिन राहुल का प्रभाव घटता जा रहा है जिससे प्रधानमंत्री पद की दावेदारी धूमिल होती जा रही है।

राहुल के घटते प्रभाव के कारण एनएसयूआई और यूथ कांग्रेस का भी देशभर में प्रभाव कम हुआ है। राहुल के अनुचित फैसलों के कारण कांग्रेस के इन दोनों संगठनों की हालत खस्ता हो गई है। पहले युवाओं में एनएसयूआई और यूथ कांग्रेस के प्रति काफी रुझान था, लेकिन राहुल गांधी के नेतृत्व में गत तीन साल के दौरान बिहार, उत्तर प्रदेश और गुजरात में मिली शिकस्त ने प्रतिकूल प्रभाव डाला है और युवा वर्ग ने इन दोनों संगठनों से भी दूरियां बना ली हैं।
विज्ञापन



और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें