यह सारण है सर। यहां सोनपुर है जहां देश का सबसे बड़ा पशु मेला लगता है। आमी देवी का प्रसिद्ध मंदिर है जहां माता सती अपने पिता दक्ष के यज्ञ कुंड में सती हुई थीं और यहां लालू प्रसाद यादव हैं जो 1977, 1989, 2004 और 2009 में लोकसभा का चुनाव जीते और कभी नहीं हारे।
भले ही यहां उम्मीदवार राजद अध्यक्ष की पत्नी और बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी और भाजपा के केंद्रीय नेता और पूर्व मंत्री राजीव प्रताप रूडी हों, लेकिन असली मुकाबला लालू यादव और नरेंद्र मोदी के बीच है।
यहां राबड़ी रूडी नहीं, लालू मोदी चुनाव लड़ रहे हैं। छपरा के एक गांव सुमेर पट्टी में अपने घर के बाहर चारपाई पर लाल कपड़े पहने बैठे रामाधार सिंह ने कही।
सारण की जनता ने हमेशा दिया लालू का साथ
बिहार पुलिस के सेवानिवृत्त सिपाही बुजुर्ग रामाधार सिंह की बात की ताईद वहां बैठे मैनेजर राय और चंद्रभूषण सिंह ने भी की। लेकिन इतना और जोड़ दिया कि साहब यहां आखिरी छह घंटों में फिजा बदल जाती है।
जब भी लालू यादव के सामने कोई राजनीतिक चुनौती आई है, सारण ने हमेशा उनका साथ दिया है। यह बात एक दो जगह नहीं, सारण जिसे पुराने नाम छपरा से ज्यादा जाना जाता है, में जगह जगह घूमने पर राजद समर्थकों के मुहं से सुनने को मिलती है।
जब 2009 में वह सारण और पाटलीपुत्र दोनों जगह से लड़े थे और पाटलीपुत्र से हार गए थे, तब भी सारण ने ही उन्हें जिताकर लोकसभा में भेजा था। इस बार कानूनी रोक की वजह से लालू खुद चुनाव मैदान से बाहर हैं, इसलिए उन्होंने राबड़ी देवी को मैदान में उतारा है।
पिछले चुनाव ने लालू ने दी थी रूडी को पटखनी
राबड़ी और रूडी के अलावा तीसरे प्रत्याशी जनता दल (यू) के सलीम परवेज हैं, जो पिछली बार बसपा के टिकट से लड़े थे और करीब 45 हजार वोट हासिल किए थे। तब विजयी लालू प्रसाद यादव को 2.74 लाख और निकटतम प्रतिद्वंद्वी राजीव प्रताप रूडी को 2.22 लाख वोट मिले थे।
छपरा लोकसभा क्षेत्र में मुख्य सड़क पर ही है बेनीपुर। सड़क के किनारे एक दुकान पर बैठे लोग कहते हैं कि अभी चुनाव की गरमी शुरु नहीं हुई है। राबड़ी देवी के भाई व लालू के चर्चित साले साधू यादव ने निर्दलीय चुनाव लड़ने का ऐलान किया था, लेकिन अब वह पीछे हट गए हैं।
डुमरी बुजुर्ग गांव के रवि मोहन सिंह मिलते हैं, जो सीधी टक्कर राजद-भाजपा के बीच बताते हैं। हालांकि नीतीश के साथ भी कुछ अति पिछड़ी और महादलित जातियां हैं, लेकिन यहां लड़ाई में जद(यू) नहीं है।
लालू की सबसे बड़ी देन है रेल पहिया कारखाना
पास बैठे दिनेश कुमार कहते हैं रूडी चुनाव के वक्त तो आते हैं फिर दिल्ली के नेता हो जाते हैं। लालू जमीनी नेता हैं। वीरेंद्र कुमार यादव कहते हैं कि लालू ने छपरा से नाता नहीं तोड़ा। मुख्यमंत्री और रेल मंत्री रहते हुए उन्होंने क्षेत्र के लिए काम भी कराए।
लालू के जिस काम को सारण क्षेत्र के लोग सबसे ज्यादा याद करते हैं वह बेला में रेल पहिया कारखाना। लालू के रेल मंत्री रहते हुए यह कारखाना लगा। लेकिन इसी कारखाने की वजह से लालू को कुछ असंतोष का सामना भी करना पड़ सकता है।
बेला कारखाने के पास के गांव के रहने वाले पिंटू कुमार यादव कहते हैं कि कारखाना तो बन गया लेकिन ज्यादा जमीन भूमिहारों और राजपूतों की इसमें ली गई, इसलिए यादवों को नौकरी नहीं मिली।
सड़क, बिजली और जमीन की कीमत अच्छी हुई
पास खड़े कृष्णा यादव प्रतिवाद करते हैं कि ऐसा कुछ नहीं है रेल कारखाने में तकनीकी काम के लिए प्रशिक्षित कर्मचारी ही बाहर से ही आए हैं। कारखाने की वजह से इलाके का विकास हुआ है। सड़क, बिजली और जमीन की कीमत अच्छी हुई है।
दरियापुर, मनचितवां, तुलाब्रह्म, मस्तीचक में घूमते हुए तमाम लोगों से बातचीत में ज्यादातर लोग राजद-भाजपा की लड़ाई बताते हैं।
हनुमान मंदिर पर बैठे हुए कामेश्वर सिंह, वैद्य जियालाल और दूसरे लोग तीनों दलों को मजबूत बताते हैं। साधू जयप्रकाश हनुमान जी की तरफ हाथ जोड़कर कहते हैं जेकरा पर बजरंग बली की कृपा होई, वाहै जीती।
छपरा से लालू कभी हार सकते हैं क्या?
आगे बढ़ने पर दो बार विधानसभा का निर्दलीय चुनाव लड़े मदन सिंह और वीरेंद्र शर्मा मोदी लहर या लालू की हवा पर बहस करते मिले। अशोक कुमार यादव को भी लालू लहर दिखाई दे रही है, धीरज सिंह के मुताबिक मोदी की हवा है।
सुभाष राय कहते हैं कि अबै कुछो तय नहीं बा, सब जाति देख रहा है। भाजपा राजद की बराबर टक्कर बताते हुए भी कमल कुमार साह सवाल दागते हैं छपरा से लालू कभी हार सकते हैं क्या?
धूप काफी चढ़ चुकी है। हम परसा बाजार पहुंचते हैं। यह राज्य के मुख्यमंत्री रहे दारोगा राय का इलाका है। अमनौर. सोनेहो, खरिदहां में भी ऐसी ही तस्वीर मिलती है। विनोद पांडे और सुबोध पांडे सड़क किनारे एक स्कूल की ओर इशारा करते हैं जहां बच्चे खिचड़ी के लिए झगड़ रहे हैं।
बच्चे हैं, खिचड़ी है पर शिक्षक नहीं
दोनों कहते हैं यह है विकास। बच्चे हैं, खिचड़ी है पर शिक्षक नहीं हैं। पांडे बंधु साफगोई से बताते हैं कि वह भाजपा समर्थक हैं और सवर्णों में तो भाजपा की हवा चल रही है। लेकिन जातीय समीकरण हावी हैं।
हालांकि लोकसभा की लड़ाई है इसलिए सब भाजपा को चाहत हैं फिर भी कुर्मी और अति पिछड़े पूरी तरह नीतीश कुमार के साथ हैं जबकि यादव और मुसलमानों का ज्यादातर समर्थन राजद को है।
अब जद (यू) के सलीम परवेज जितने मुस्लिम वोट राजद के काटेंगे,उतने ही वह गैर यादव पिछड़े वोट भाजपा के काट सकते हैं। आखिर में लडा़ई राजपूतों और यादवों के बीच होकर रह जाएगी।
मुस्लिमों का ज्यादा झुकाव राजद की ओर
भेलदी, कटसा, गरखा, रायपुरा, चिरांदा, भैंसवार, पहाड़पुर, नवाजी टोला होते हुए सारण छपरा पहुंचने पर भी तस्वीर कमोबेश यही मिलती है।
छपरा में प्रखंड कार्यालय में काम करने वाले मुश्ताक मोहम्मद और गयासुद्दीन के मुताबिक हालांकि सलीम परवेज अकेले मुसलमान हैं, लेकिन मुस्लिम समाज का ज्यादा झुकाव राजद की तरफ है।
सलीम को भी कुछ लोग वोट करेंगे। विष्णुपुरा,जलालपुर,लोदीपुर, गोल्डनगंज,मेंहदीपुर, डूगरी अड्डा, नयागांव,हसनपुर, गोपालपुर, महदली चक, शेख बुघारी, सिताबगंज, पहलेजा घाट, गोविंदचक पर भी कई लोगों से बात में कमोबेश यही तस्वीर मिली।
जदयू-भाजपा के अलगाव से राजद मजबूत
इस लोकसभा क्षेत्र की छपरा, गरखा और सोनपुर विधानसभा सीट पर भाजपा, अमनौर और परसा पर जद(यू) और मढ़ौरा में राजद का कब्जा है। लेकिन तब जद (यू) भाजपा गठबंधन की वजह से राजद का पलड़ा कमजोर हो गया था। इस बार जद(यू) भाजपा अलग अलग हैं।
राजद कार्यकर्ता इस स्थिति को फायदेमंद मान रहे हैं। क्योंकि उन्हें क्षेत्र के करीब साढ़े तीन लाख यादव और सवा लाख मुस्लिम मतदाताओं के समर्थन का पूरा भरोसा है।
वहीं भाजपा के रूडी केलिए करीब सवा तीन लाख राजपूत, अस्सी हजार कायस्थ,करीब तीस हजार भूमिहार और ब्राह्मण, मतदाताओं केसमर्थन का दावा है। जद(यू) अति पिछड़ों, महादलितों केसाथ पसमांदा मुसलमानों को अपनी ताकत मान रहा है।