चंदौली के दुबौलिया गांव के प्रगतिशील किसान मनोज दुबे कहते हैं, वह करीब 25 एकड़ में धान की खेती करते हैं। हर साल 15 जुलाई तक रोपाई का काम पूरा हो जाता था। पर इस बार बमुश्किल चार एकड़ में निजी ट्यूबबेल के सहारे रोपाई कर पाए हैं। खेतों में उड़ती धूल देख दिल हलाकान रहता है। सारा दिन मेघों की तरफ देखा करते हैं। कृषि स्नातक दुबे कहते हैं, एक हफ्ते के भीतर इन्द्र देवता की कृपा हो जाए तो किसान संकट से कुछ उबर सकता है।
पर मनोज की बात को उनके 82 वर्षीय पिता कमला दुबे बीच में ही काटते हुए महाकवि घाघ की एक कहावत सुनाते हैं। ‘जै दिन जेठ बहे पुरवाई, तै दिन सावन धूल उड़ाई। इस साल जेठ में करीब 25 दिन जमकर पुरवाई चली थी। मेरा मन तो तभी से धुकधुक कर रहा था। पर्याप्त बारिश की उम्मीद कम ही है।’ पास ही में खड़े गिरीश अपने ट्रैक्टर का टूटा फाल दिखाते हुए कहते हैं कि देखिए जमीन इतनी सख्त हो गई है कि लोहे का फाल टूट गया। जिस जमीन में जुताई संभव नहीं हो पा रही है, धान क्या पैदा होगा?
सूखे को लेकर चिंता भरी बतकहियों का सिलसिला न केवल दुबौलिया गांव बल्कि धान का कटोरा कहे जाने वाले चंदौली जिले के तकरीबन हर गांव में आजकल सुनने को मिल जाएगा। मुगलसराय से आगे बढ़ते ही सड़क से जिस तरफ नजर डालिए, सूखे खेत ही नजर आते हैं, पैर में फटी बिवाई सरीखी दरारों की तरह। हरियाली मात्र उन खेतों में दिखाई देती है जो नहर किनारे हैं या जिनके बीच में ट्यूबबेल गड़े हैं। किसान हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं, उनके पास कोई काम ही नहीं। गांव के किसी घने पेड़ की छांव तले भविष्य की चिंता साझा करते दिन बीत जाता है। इनकी चिंता बेमानी भी नहीं।
मात्र सवा फीसदी में रोपाई
जिला कृषि अधिकारी कमलजीत सिंह बताते हैं जिले में करीब एक लाख 13 हजार हेक्टेअर में धान रोपा जाता है जिसमें से इस बार बमुश्किल सवा फीसदी हिस्से (1630 एकड़) में धान की रोपाई हो पाई है।
सामान्य बारिश के सीजन में 15 जुलाई तक तकरीबन 50 फीसदी हिस्से में रोपाई हो जाती थी। इस साल जिले में 312 मीट्रिक टन धान उत्पादन का लक्ष्य रखा गया था पर अब उसे हासिल कर पाना मुश्किल है।
एक हफ्ते तक और बारिश न हुई तो स्थितियां बहुत जटिल हो जाएंगी। सूखे की आसन्न विभीषिका का हाल बयान करते हुए वह यह बताना नहीं भूलते इस साल 14 जुलाई तक जिले में मात्र 45.44 मिमी बारिश हुई जबकि सामान्य मानसून की स्थिति में 30 जुलाई तक 307.31 मिमी बारिश हो जानी चाहिए।
पशुओं के लिए ज्यादा संकट
आजमगढ़, जौनपुर व सोनभद्र सहित पूर्वांचल के कई अन्य जिलों में सूखे की काली छाया किसानों को डरा रही है। आजमगढ़ के रामसुधार यादव बताते हैं कि मनुष्यों से ज्यादा पशुओं पर संकट है। बारिश न होने से खेतों में खड़ा पशुओं का चारा जहरीला होने लगा है। पीने के पानी के लिए पशुओं को कई किलोमीटर दूर तक ले जाना पड़ रहा है। हरा चारा न मिलने के कारण दुधारू पशुओं का दूध कम हो गया है। जानवरों को औने-पौने दामों में बेच देने के सिवा कोई रास्ता सूझ ही नहीं रहा है।
मेंढ़क-मेंढ़की की शादी
ऐसे में लाचार, बेबस किसान इन्द्र देवता को रिझाने की सोच रहा है। सोनभद्र के आदिवासी बहुल बभनी ब्लाक के खगरी गांव के प्रधान जगत गोंड कहते हैं कि नाराज इन्द्र देवता को मनाने के लिए सोमवार को हम लोगों ने अपने कुलदेवता की प्रतिमा को छाजन दिया है। 3-4 दिन में न माने तो पूरे विधि विधान से मेंढ़क-मेंढ़की का ब्याह रचाया जाएगा, तब देवता अवश्य मान जाएंगे।
नुकसान की भरपाई संभव नहीं
पर बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी में कृषि विज्ञान केंद्र के समन्वयक प्रोफेसर श्रीराम सिंह कहते हैं ‘बारिश न होने के कारण धान की करीब 50 फीसदी फसल खराब हो चुकी है। संकट भयावह है। अगर एक हफ्ते बारिश न हुई तो सूखे की काली छाया और गहराएगी। वैसे अब बारिश हो भी गई तो अब तक हुए नुकसान की भरपाई संभव नहीं होगी।
प्रदेश में सिंचाई पर बड़ा संकट
मानसून की नाराजगी किसानों पर भारी पड़ने लगी है। बारिश के इंतजार में नर्सरी सूख रही है और धान की रोपाई पिछड़ गई। सूखे जैसे इन हालातों में सबसे ज्यादा दुखी हैं वह किसान जो नहरों पर निर्भर हैं। डैम से नहरों में पानी पहुंच ही नहीं पा रहा है। प्रदेश के सोलह जनपदों को सिंचाई के लिए पानी देने वाले कालागढ़ डैम पर भी लगातार दबाव बढ़ रहा है।
उत्तर प्रदेश की एक बड़ी नहर प्रणाली का संचालन कालागढ़ डैम से होता है। उत्तराखंड में स्थित इस डैम से बिजनौर, अमरोहा, मुरादाबाद, नरौरा, अलीगढ़, बुलंदशहर, एटा, मैनपुरी, इटावा, कन्नौज, कासगंज, कानपुर, उन्नाव, कानपुर देहात, फर्रुखाबाद तक पानी की सप्लाई होती है। इन जनपदों से हर रोज नौ हजार क्यूसेक पानी की डिमांड की जा रही है मगर डैम प्रशासन केवल पांच हजार क्यूसेक पानी प्रतिदिन ही दे पा रहा है। इस डैम से गंगा के जरिए पानी नहरों तक पहुंचता है। छह लाख किसान इन नहरों के माध्यम से अपनी फसलों की सिंचाई करते हैं।
खास बात यह है कि डैम से जो पानी छोड़ा जाता है वह गंगा से होते हुए नहरों तक पहुंचता है। लेकिन जब गंगा में ही पानी कम हो जाता है तो डैम का पानी नहरों में टेल तक नहीं पहुंच पाता। तुमड़िया डैम (ऊधमसिंह नगर), पीली डैम (बिजनौर), बौर और हरिपुर (ऊधमसिंह नगर) जलाशय में भी पानी कम हैं। इन डैम से 60 से भी ज्यादा नहरों को पानी दिया जाता है। अधीक्षण अभियंता यूके भारद्वाज का कहना है कि कालागढ़ डैम में अभी करीब दो महीने का पानी है। बाकी जो छोटे डैम में उनमें पानी की कमी हो गई है। बरसात के बाद ही स्थिति सुधरेगी।
वेस्ट में चार मीटर नीचे खिसका पानी
मेरठ, बागपत, बुलंदशहर, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, गाजियाबाद, नोएडा, अलीगढ़, बरेली, मथुरा, फिरोजाबाद, हाथरस, मुरादाबाद, बिजनौर, रामपुर और संभल में पिछले दस वर्षों के भीतर भूगर्भ जल तीन से चार मीटर तक नीचे खिसक गया है।
भूगर्भ जल विभाग द्वारा जारी किए गए आंकड़े बताते हैं कि इन इलाकों में पानी का दोहन तेजी से हो रहा है। भूगर्भ जल विभाग के अधिशासी अभियंता सुरेश कुमार मल्होत्रा का कहना है कि इन्हीं जनपदों में डार्क ब्लाक की संख्या सबसे अधिक है।
खास बात यह है कि किसानों के नलकूप पानी का साथ छोड़ने लगे हैं। जहां पानी आ भी रहा है उसका प्रेशर बहुत कम है। ऐसे में सिंचाई पर बड़ा संकट हो गया।