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AK-49: अरविंद केजरीवाल का नया वार

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समाजसेवी अन्ना हजारे के जनलोकपाल बिल के आंदोलन से सुर्खियों में आए अरविंद केजरीवाल का जीवन बेहद उतार-चढ़ाव भरा रहा है। आईआईटी खडगपुर से मैकेनिकल इंजीनियर केजरीवाल अपने कैरियर के शुरुआती दिनों से ही सामाजिक कार्यों से जुड़े रहे।
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हरियाणा के हिसार में 16 अगस्त 1968 को जन्मे केजरीवाल भारतीय राजस्व सेवा में भी रहे, लेकिन सामाजिक कार्यों में शामिल होने के लिए उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ दी।

'सूचना के अधिकार' पर काम कर रहे केजरीवाल ने दिल्ली के रामलीला मैदान में अन्ना हजारे के साथ मिलकर जनलोकपाल बिल के लिए आंदोलन छेड़ा। इस आंदोलन ने केजरीवाल को नई पहचान दी।
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आंदोलन के दौरान मंच पर अन्ना और मंच के बाहर केजरीवाल ने मिलकर मोर्चा संभाला। जनलोकपाल बिल को लेकर सरकार और केजरीवाल के बीच कई बार तनातनी हुई, जिसका परिणाम यह हुआ कि केजरीवाल न्यूज चैनलों और अखबारों की सुखिर्यां बनते चले गए।

शीला को सियासी पटखनी, दिल्ली पर कब्जा

जनलोकपाल के मुद्दे पर ही केजरीवाल ने भी दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनशन किया। हालांकि इस बार यह आंदोलन बिना किसी परिणाम के ही खत्म हो गया, लेकिन यहां से केजरीवाल का रुझान सक्रिय राजनीति की ओर हो गया।

अन्ना आंदोलन के उनके कई साथी और खुद अन्ना हजारे भी केजरीवाल के राजनीति में जाने के फैसले के खिलाफ थे, लेकिन केजरीवाल ने विरोध के बावजूद नवंबर 2012 में 'आम आदमी पार्टी' बनाकर अपने राजन‌ीतिक जीवन की शुरु‌आत कर दी।

दिल्ली को अपने सियासी संग्राम का पहला पड़ाव बनाते हुए केजरीवाल ने सीधे मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को चुनौती दी। केजरीवाल ने शीला द‌ीक्षित के खिलाफ नई दिल्ली से विधानसभा चुनाव जीतकर देशभर में वाह-वाही लूटी।

तमाम पॉलिटिकल पंडितों के सर्वे को पीछे छोड़ते हुए आम आदमी पार्टी को दिल्ली विधानसभा चुनाव में कुल 28 सीटें मिलीं। केजरीवाल के लिए राजनीतिक रूप से यह बहुत बड़ी जीत थी।

आलोचना के बीच बिजली, पानी पर फैसले

विधानसभा चुनावों में केजरीवाल को हालांकि पूर्ण बहुमत नहीं मिला, लेकिन भाजपा के सरकार बनाने से इंकार करने के बाद कांग्रेस के बाहरी समर्थन के जरिए आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में सरकार बनाई।

इस सरकार के बनने के साथ ही दिल्ली की जनता ने उम्मीदों भरी निगाहों से केजरीवाल की ओर देखा। अब वक्त उन वादों को निभाने का था, जो चुनावों से पहले केजरीवाल ने दिल्ली की जनता से किए थे।

केजरीवाल ने सबसे पहले पानी के मुद्दे पर दिल्ली की जनता को राहत दी। दिल्ली वासियों को प्रति माह 20 हजार लीटर पानी मुफ्त देने को फैसला लेकर सरकार ने अपना पहला वादा पूरा किया।

इसके बाद केजरीवाल के दूसरे वादे यानी बिजली के बिल कम करने का नंबर था। सरकार ने 400 यूनिट तक की बिजली खपत पर दरें आधी कर दिल्ली की जनता को दूसरी राहत दी।

हालांकि इन फैसलों को लेकर कांग्रेस सहित विपक्षी ‌दल भाजपा ने उनकी काफी आलोचना की और सरकार पर जनता को धोखा देने का आरोप लगाया।

गाड़ी और बंगले ने कराई किरकिरी

आम आदमी की राजनीति का दावा कर दिल्ली की सत्ता तक पहुंचे केजरीवाल को कभी अपने मंत्रियों, तो कभी खुद की वजह से विपक्षियों के साथ-साथ मीडिया के तीखे सवालों का भी सामना करना पड़ा।

केजरीवाल सरकार के मंत्रियों ने जब लग्जरी सरकारी गाडियां ली तो देशभर में उनकी नीयत पर सवाल उठने लगे। भाजपा सहित कांग्रेस ने सरकार के मंत्रियों को लेकर केजरीवाल पर तीखा हमला बोला।

लेकिन हद तो तब हो गई जब केजरीवाल के रहने के लिए दिल्ली के एक महंगे रिहायशी इलाके में 10 बेडरूम का बंगला सरकार की तरफ से दिया गया। इसके बाद तो जैसे चारों तरफ से केजरीवाल पर हमले तेज हो गए। आलोचनाओं के चलते केजरीवाल को बंगला लेने का फैसला पलटना पड़ा।

दिल्ली पुलिस के खिलाफ सड़क पर उतरे सीएम

दिल्ली के मालवील नगर में कथित सेक्स और ड्रग रैकेट को लेकर कानून मंत्री सोमनाथ भारती के साथ दिल्ली पुलिस का जब विवाद हुआ तो केजरीवाल खुलकर अपने मंत्री के समर्थन में आ गए।

केजरीवाल ने पहले उपराज्यपाल और फिर गृहमंत्री से मिलकर दिल्ली पुलिस के खिलाफ अपनी शिकायत दर्ज कराई। दोनों जगह से जब केजरीवाल को कुछ हासिल नहीं हुआ तो उन्होंने दिल्ली पुलिस के खिलाफ धरने का ऐलान कर दिया।

केजरीवाल ने अपने मंत्रियों और समर्थकों के साथ दिल्ली में रेल भवन के सामने धरना दिया और दिल्ली पुलिस के ‌अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।

कुछ आलोचनाओं और कुछ सफलता के बाद केजरीवाल ने अपना धरना खत्म किया। इस धरने को लेकर केजरीवाल की नीतियों की जमकर आलोचना हुई।
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और हो गई 49 दिन की सरकार की विदाई

जनलोकपाल ब‌िल व‌िधानसभा में पास नहीं करा पाने के कारण द‌िल्ली के मुख्यमंत्री अरव‌िंद केजरीवाल ने उपराज्यपाल को अपना इस्तीफा भेज द‌िया।

केजरीवाल ने पहले ही साफ कर द‌िया था क‌ि जनलोकपाल ब‌िल पास कराना उनकी प्रमुख मांग है और अगर वो इस ब‌िल को पास नहीं करा पाएंगे तो अपने पद से इस्तीफा दे देंगे।

कार्यवाही के दौरान सदन में ‌ब‌िल पेश करने के व‌िरोध में कांग्रेस और भाजपा के 42 व‌िधायकों ने मतदान क‌िया था। जबक‌ि 27 व‌िधायकों ने इसके समर्थन में मतदान क‌िया था। भारी व‌िरोध के कारण ब‌िल सदन में पेश नहीं हो पाया।

कांग्रेस और भाजपा दोनों ने पहले से ही साफ कर द‌िया था क‌ि अगर ब‌िल कानून सम्मत होगा तभी वह उसका समर्थन करेंगे। इससे पहले आम आदमी पार्टी के बड़े नेता योगेंद्र यादव ने आरोप लगाया क‌ि कांग्रेस और बीजेपी के नेताओं ने हाथ म‌िला ल‌िए हैं।
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