परिवार एक है लेकिन इसमें बेटियों की मजबूती के दो पहलू देखने को मिलते हैं। पराई बेटियों की परवरिश बेटों जैसे लगाव से करने की मिसाल है तो इन बेटियों की पितातुल्य शख्स के प्रति बेटे से बढ़कर भूमिका निभाने का उदाहरण भी।
फिल्म की पटकथा जैसी लगने वाली यह कहानी है गोरखपुर यूनिवर्सिटी से विदाई के बाद दुनिया को अलविदा कह चुके प्रो. जेएन पाण्डेय के परिवार की।
ऐसा परिवार जहां रिश्तेदारियों के बीच अपनेपन का ऐसा रिश्ता जन्मा जिसने करीब 67 साल पहले दो बेटियों को पढऩे और आगे बढऩे का मजबूत परिवेश दिया। ये बेटियां भी सपूत साबित हुईं। परवरिश करने वाले प्रो. पाण्डेय को खुद पर निर्भर मानकर आजीवन अविवाहित रहने का निर्णय लिया।
यही नहीं बढ़ती उम्र के बीच पिता की देखरेख में कमी न रह जाए, इस डर से प्रोफेसर बेटी ने यूनिवर्सिटी से मिले प्रमोशन ऑफर को भी ठुकरा दिया।
अंतिम समय तक परवरिशकर्ता के प्रति वो संजीदगी बनाए रखी, जिससे अमूमन लाडले बेटे भी चूक जाते हैं। अब दोनों बहनें एक दूसरे की मजबूती के साथ एक-दूजे के साथ हैं।
इन बहनों के चेहरे पर बेटी होने का दर्प है और आंखों में इसका नाज कि इन्होंने बेटी शब्द से जुड़े कई मिथकों को तोड़ा है। जिंदगी में संतुष्टि, इस बात की कि इन्होंने वह रिश्ता बखूबी निभाया, जिसकी नींव 1956 में तब पड़ी जब बरेली के साहूकारा मोहल्ले में रहने वाले राजेंद्र मोहन मिश्र का निधन हो गया।
बेटियों को बड़ी जिम्मेदारी समझे जाने वाले उस दौर में सात साल की संध्या और छह वर्ष की निशा के भविष्य को लेकर सवाल उठा, जिनके पास सहारे के लिए मां और छोटे भाई के अलावा बूढ़ी दादी ही थीं।
बुजुर्ग दादी ने यह चिंता अपने भाई के बेटे गोरखपुर यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर जेएन पांडेय से साझा की। तत्काल दूसरा बेहतर विकल्प न देख प्रो. पांडेय ने परिवार के सभी सदस्यों को अपने पास बुलाकर तीनों बच्चों की पढ़ाई शुरू करा दी।
गुजरते वक्त के बीच संध्या ने एमएससी किया और निशा भी एमएससी बाद प्रो. निशा बन गईं। इन बेटियों की अच्छी परवरिश में खुद का परिवार आड़े न आए, यह सोचकर प्रो. पांडेय ने अपनी शादी का इरादा त्याग दिया।
जब बेटियां बड़ी हुईं तो पिता जैसी भूमिका निभाने वाले ताऊ जी के एकाकीपन की चिंता में दोनों ने बेटियों के अलग घर बसाने की सामान्य परंपरा से किनारा कर लिया।
यही नहीं पिछले साल प्रो. निशा को अपने विभाग की हेडशिप का प्रस्ताव मिला लेकिन तब प्रो. पांडेय बीमार थे। प्रो. निशा ने खुद की तरक्की के प्रस्ताव को ठुकरा दिया। दिसंबर 2012 में प्रो. पांडेय का निधन हो गया।
बरेली में रह रहे निशा और संध्या के भाई ने प्रो. पांडेय को अंतिम विदाई दी, जबकि दोनों बहनें उनसे मिले संस्कारों को आगे बढ़ा रही हैं। इसमें शामिल है प्रो. पांडेय की सप्ताह में एक दिन होमियोपैथ की निशुल्क दवा देने की परंपरा भी। पुराने दिनों में गरीबों को निशुल्क दवा वितरण में निशा प्रो पाण्डेय की सहायक होती थीं, जबकि अब वह हर रविवार खुद यह सेवा करती हैं।
एक दूसरे के लिए दोनों का निश्चय यूं ही साथ रहने का है। एक दूसरे का सहारा बनने के साथ-साथ वह सहारा बनी हुई हैं 85 वर्षीय मां का भी, जिन्हें बरेली में रह रहे बेटे से ज्यादा इन अनूठी बेटियों के साथ रहने में तसल्ली मिलती है।
लेडी हूं पर ले-डाउन नहीं हुई
अलग तरह की जिंदगी के सवाल पर प्रो. निशा कहती हैं कि भविष्य के सपने बुनने की जगह उन्होंने सामने मौजूद जिंदगी में सर्वोत्तम करने का प्रयास किया। कहती हैं-मां ने हम दोनों बहनों को यहीं शिक्षा दी थी। गर्व इस बात का है कि लेडी हूं, लेकिन कभी ले-डाउन नहीं हुई।
ईश्वर से हर रोज यही प्रार्थना भी करती हूं कि वह मेरे भीतर शक्ति के साथ दूसरे का भला करने का जज्बा भी दें। बड़ी बहन की ओर इशारा करके कहती हैं कि हम दोनों बहनें आपस में अच्छी दोस्त भी हैं। बीच में कुछ भी छिपा नहीं है।
दीदी को मेरी फिक्र रहती है और मुझे उनकी और मां की। दीदी संध्या इसका समर्थन करती हैं और दोनों एक साथ कहती हैं कि ताऊ जी ने उनके लिए जो किया, हमने उसका बदला नहीं दिया बल्कि उन्हें अपनापन दिया, जिसकी जरूरत हर वक्त होती है लेकिन उम्र बढऩे पर ज्यादा।