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'असहिष्णुता' पर मोदी की आलोचना कितनी सही?

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पिछले कुछ समय से भारत में कलाकारों, लेखकों, शिक्षाविदों और वैज्ञानिकों ने कथित रूप से बढ़ रही असहनशीलता पर चिंता जताई है। अवार्ड वापसी का लेखकों से शुरू हुआ आंदोलन वैज्ञानिकों, इतिहासकारों और फ़िल्म कलाकारों तक फैल गया।
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भारत और विदेशों में शैक्षणिक संस्थानों से जुड़े तक़रीबन 200 शिक्षाविदों ने बढ़ती 'असहिष्णुता और कट्टरपन' के ख़िलाफ़ एक संयुक्त बयान जारी किया था।

संसद के मौजूदा शीतकालीन सत्र में भी असहिष्णुता पर बहस जारी है। इसी मुद्दे पर अमरीका और फ्रांस में पढ़ा रहे भारत के प्रमुख इतिहासकारों और जीवनीकारों में से एक संजय सुब्रमण्यम से बात की बीबीसी न्यूज़ऑनलाइन के सौतिक बिस्वास ने।

'भारत में असहिष्णुता कोई नई चीज नहीं'

मैंने उनसे पूछा कि क्या भारत प्रधानमंत्री मोदी के राज में असहिष्णु हो गया है?

भारत में असहिष्णुता कोई नई चीज़ नहीं है। तो फिर हम पिछले साल भाजपा सरकार के सत्ता में आने के बाद जो कुछ हुआ है, उसे लेकर अचानक बहुत उग्र और चिंतित क्यों है?

मैंने भारत को पिछले लगभग एक साल से नहीं देखा है। इसलिए मेरी धारणा दूर से देखने पर आधारित है। फिर भी, ऐसा लगता है कि चिंता इस तथ्य से उभरी है कि भाजपा को संसद में प्रचंड बहुमत मिला है, जिसे उनके पास अपने उस एजेंडे को लागू करने के मौक़े के रूप में देखा जा सकता है जो वो 1998-2004 के दौरान नहीं कर सके थे, जब उनकी पार्टी पहले सत्ता में थी। अगर ये गठबंधन सरकार होती तो लोग बहुत परवाह नहीं करते।

इसके अलावा, मौजूदा सरकार लगातार दो तरह की बातें करती है। एक आवाज़ वो है जो वाजिब, सहिष्णु और आश्वस्त करने वाली है, जबकि दूसरी अधिक आक्रामक और कठोर है।

इस सोचे-समझे दोहरेपन में 'अच्छा सैनिक, बुरा सैनिक' की लगातार संशोधित रणनीति अंतर्निहित है। ऐसे में स्वाभाविक तौर पर चिंतित होने वाली बात है कि इस सरकार के लिए पांच साल तक काम करने का ढर्रा क्या यही होगा।

विरोधियों को देश छोड़ने को कहा जाता है

क्या आपको लगता है कि भारत वास्तव में अधिक असहिष्णु हो गया है? क्या ये इस वजह से नहीं है कि कांग्रेस और दूसरी ग़ैर भाजपा शासित राज्य सरकारों में इस मुद्दे पर खड़े होने का दम नहीं है।

ये 'भारत' का सवाल नहीं है, बल्कि ये राजनीतिक दलों के रवैये से जुड़ा हुआ है। ये सही है कि स्वतंत्र भारत में आज़ाद ख़्यालों की डोर हमेशा से नाज़ुक रही है। इन पर हमला करने वालों में भाजपा इकलौती नहीं है, कुछ ही राजनीतिक दलों ने वास्तव में राजनीतिक उदारवाद को अपनाया है। लेकिन क्या इससे भाजपा को आलोचना से बचने का अधिकार मिल जाता है?

मुझे दो जेबकतरों द्वारा लूटा जा रहा है, क्या ये किसी तरह की तसल्ली है? अगर वर्तमान राजनीतिक माहौल की आलोचना सिर्फ़ राजनीतिक कारणों से होती और सिर्फ़ ख़ुद भी काले कारनामों में शामिल राजनीतिक दलों (जैसे कांग्रेस) द्वारा होती तो इतना बवाल नहीं मचता। लेकिन ये आलोचना समाज के उन विभिन्न वर्गों के लोगों से आई है, जिन्हें असुरक्षा महसूस होती है और जब वे अहिंसक तरीक़े से प्रदर्शन करते हैं तो उन्हें बेरहमी से देश छोड़ने और कहीं और जाने को कह दिया जाता है। ये बहुमत की अशिष्ट भाषा है। कई संस्थानों में इसे महसूस किया गया। विश्वविद्यालयों में मेरे दोस्त ऐसा महसूस कर रहे हैं।
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भाजपा के डराने-धमकाने को क्या माना जाए?

तो वो सहनशीलता भाजपा के मौजूदा शासन की सहनशीलता से कितनी अलग थी? क्या हम बहुत ज़्यादा घबरा रहे हैं?

निश्चित तौर पर चिंता करने की वजहें भी हैं, जब कुछ लोग अपनी भाषा में इतने कठोर और बेरहम शब्दों का इस्तेमाल करने लगें। ऐसा करने वालों में सिर्फ़ भाजपा ही शामिल नहीं है, बल्कि वे भारत के उन लोगों में शामिल हैं जो भारत के कई हिस्सों में सत्ता में हैं।

अगर मैं पाकिस्तान में रहता तो मेरी चिंता सुन्नी कट्टरपन से जुड़ी होती, अगर मैं फ्रांस में रहता और बहुमत की ऐसी भाषा इस्तेमाल करता कि 'या तो मेरी शर्तों पर फ्रांसीसी बनो वरना नतीजे भुगतो।' तो चिंता करता। इस तरह की बातों का विरोध करने की आवश्यकता है। जैसा कि 1975 में आपातकाल के दौरान हुआ या नंदीग्राम नरसंहार के वक़्त हुआ था।

भाजपा के डराने-धमकाने को हमें अपवाद क्यों मानना चाहिए?
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