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राष्ट्रपति प्रणब ने मोदी सरकार को दी थी चेतावनी, आखिर क्यों?

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चौदहवें वित्त आयोग की रिपोर्ट के आधार पर राज्यों के लिए केंद्र का खजाना पूरी तरह खोलने का फैसला होने से पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने केंद्र सरकार को इसको लेकर सचेत किया था।
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समझा जाता है कि राष्ट्रपति ने राज्यों के लिए तिजोरी का मुंह खोलने से संघीय ढांचे में केंद्र की पकड़ किसी रूप में कमजोर न हो इसकी परख कर लेने को कहा था। सरकार के महकमों में भी केंद्रीय करों में राज्यों का हिस्सा एकमुश्त 10 फीसदी बढ़ाने को लेकर न केवल हिचक थी, बल्कि जबरदस्त माथापच्ची भी चल रही थी।

वित्त मंत्रालय भी आयोग के असहमति के नोट को आधार बनाकर हिस्सेदारी कम करने के पक्ष में था। मगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सारे सवालों-संशयों को किनारा करते हुए वित्त आयोग की सिफारिशों को अक्षरश: लागू करने का निर्णय ले लिया।
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सत्ता प्रतिष्ठान के भरोसेमंद उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार राष्ट्रपति मुखर्जी ने वित्त आयोग की रिपोर्ट का अध्ययन करने के बाद खुद पहल कर सरकार को फैसला लेने में पिछले सभी वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुभवों पर गौर करने को कहा था।

राज्यों के लिए तिजोरी खोलने के पक्ष में नहीं थे राष्ट्रपति

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने इस संदर्भ में पीएम मोदी को संघीय व्यवस्था में केंद्र की मजबूती कायम रहने के पहलुओं को ध्यान में रखने की भी सलाह दी थी।

बताया जाता है कि प्रधानमंत्री भी पहले वित्त आयोग की रिपोर्ट में असहमति के नोट को आधार बनाकर हिस्सेदारी को 3 से 4 फीसदी के अंदर ही रखने की वित्त मंत्रालय की राय से सहमत हो गए थे।

मगर शीर्ष स्तर पर आखिरी समय में हुई चर्चाओं के बाद पीएम ने राज्यों की हिस्सेदारी एकमुश्त 10 फीसदी बढ़ाने का निर्णय ले लिया। नि:संदेह यह बड़ा राजनीतिक फैसला इसलिए भी अहम है क्योंकि आज तक किसी वित्त आयोग ने राज्यों को दो-तीन फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी देने की सिफारिश नहीं की थी।

सरकार के उच्च महकमों में पीएम के इस बड़े फैसले को लेकर चर्चा इसीलिए भी है कि क्योंकि कांग्रेस ही नहीं जनसंघ और भाजपा राज्यों को अधिकार संपन्न बनाने की पैरोकारी के साथ-साथ संघीय प्रणाली में केंद्र के मजबूत रहने के सैद्धांतिक हिमायती रहे हैं।
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केंद्र की पकड़ ढीली न होने की दी थी चेतावनी

ऐसे में मोदी सरकार का राज्यों के हक में यह फैसला क्रांतिकारी कदम से कम नहीं आंका जा रहा। चुनाव के दौरान मोदी ने राज्यों को कटोरा लेकर केंद्र के सामने नहीं गिड़गिड़ाने की नौबत नहीं आने देने का वादा किया था।

हालांकि तब इसे गठबंधन राजनीति के दौर को देखते हुए क्षेत्रीय दलों को साधने की सियासी कूटनीति मानी गई थी। राजनीतिक गलियारे में मोदी के इस फैसले में कहीं न कहीं संघ की भूमिका होने की बात भी कही जा रही है।

तभी पूर्ण बहुमत होने के बावजूद एक झटके में ही राज्यों की केद्रीय कर में हिस्सेदारी 1 लाख 85 हजार करोड़ बढ़ाने का मोदी सरकार का यह फैसला बड़ा ही नहीं बल्कि सियासी रुप से बेहद संवेदनशील भी है। इसलिए विरोधी कांग्रेस भी इसको लेकर सवाल नहीं उठा रही।

हालांकि 14वें वित्त आयोग के सदस्य प्रोफेसर गोविंद राव आयोग की सिफारिशें हूबहू लागू करने के सरकार के फैसले को सही मानते हैं। राव ने अमर उजाला से कहा कि हमारे संवैधानिक ढांचागत स्वरूप में इसका प्रावधान है।

वास्तव में योजना आयोग के जरिये केंद्र ने अब तक अपना दायरा बढ़ा लिया था। लेकिन राव यह भी कहते हैं कि राज्यों के साथ सहकारिता-सहयोग के संघीय ढांचे में इतनी बड़ी रकम के सही इस्तेमाल की मानटिरिंग के लिए भी एक व्यवस्था होनी चाहिए।
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