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राष्ट्रपति के लिए आसान नहीं रहा फलस्तीनी सफर

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राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी सोमवार को पश्चिम एशियाई दौरे के अपने दूसरे पड़ाव फलस्तीन पहुंचे। भारत के किसी राष्ट्राध्यक्ष की फलस्तीन की यह पहली यात्रा है। लेकिन जरा फलस्तीन तक पहुंचने की दास्तां भी जान लीजिए। राष्ट्रपति का रामल्ला तक का सफर उतना आसान नहीं रहा।
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राष्ट्रपति जॉर्डन की यात्रा समाप्त कर वहां से विशेष विमान द्वारा इस्राइल के तेल अवीव के बेन गुरियन एयरपोर्ट पर पहुंचे। वहां उतरने के बाद राष्ट्रपति का कारवां सड़क के रास्ते फलस्तीन के लिए रवाना हुआ।

यह कारवां बिटूनिया चेक पाइंट पर पहुंचा जो इस्राइल और फलस्तीन को बांटता है। यहां इस्राइल की सरहद समाप्त होती है और फलस्तीनी क्षेत्र शुरू होता है।

पूरे कारवां को इस्राइल-फलस्तीन की सीमा पर रोक दिया गया। राष्ट्रपति को एक सुरक्षित स्थान पर उतारा गया और इस्राइली वाहन से उतारकर उन्हें फलस्तीन वाहन में बिठाया गया और तब आगे की यात्रा शुरू हुई। दरअसल, दोनों पक्ष एक दूसरे के वाहनों की अपने क्षेत्र में आवाजाही पसंद नहीं करते हैं।
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प्रणब मुखर्जी को भी बदलने पड़े कई वाहन

राष्ट्रपति के अलावा अधिकारियों और मीडियाकर्मियों को इस्राइली वाहनों से उतरकर लगभग आधा किलोमीटर पैदल चलकर फलस्तीन प्राधिकरण के वाहनों में बैठा और रामल्ला पहुंचा।

खबरें पढ़ने से यह अंदाजा नहीं होता कि फलस्तीन की किस तरह से घेराबंदी है।  फलस्तीन को अभी तक तकनीकी रूप से पूर्ण देश का दर्जा हासिल नहीं है।

यहां फलस्तीन अंतरराष्ट्रीय प्राधिकरण की सत्ता चलती है और इसके राष्ट्रपति महमूद अब्बास हैं, लेकिन पश्चिमी तट के एक हिस्से पर आतंकवादी संगठन हमास का सिक्का चलता है।

भारत के फलस्तीन में राजदूत नहीं कहलाते बल्कि वह भारत के प्रतिनिधि कहे जाते हैं। स्थिति यह है कि बिना इस्राइल की अनुमति के हवाई, समुद्र या सड़क के रास्ते फलस्तीन नहीं पहुंच सकते हैं।

हवाई मार्ग के लिए तेल अवीव उतरना होगा और सड़क के रास्ते के लिए भी बिना इस्राइली सीमा लांघ कर आप नहीं पहुंच सकते। इसमें सबसे मुश्किल तब आती है जब दोनों पक्षों के बीच तनाव होता है तो फलस्तीन की आपूर्ति रुक जाती है।

रामल्ला पहुंचने पर राष्ट्रपति का भव्य स्वागत किया गया। फलस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास के साथ उन्होंने गार्ड ऑफ ऑनर का निरीक्षण किया।

इससे पहले जॉर्डन में ही राष्ट्रपति ने कहा था कि भारत फलस्तीन को अपने समर्थन के सिद्धांत पर कायम है। भारत ने हमेशा बातचीत के जरिए संप्रभु, स्वतंत्र और संयुक्त फलस्तीन का पक्ष लिया है।
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