फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

7 सर्वोच्च शिखर फतह करने वाली पहली भारतीय बनी ये महिला

Fri, 31 May 2013 06:26 PM IST
नई दिल्ली/एजेंसी
विज्ञापन
विज्ञापन
महिला साहस की अद्वितीय मिसाल बन चुकीं झारखंड के जमशेदपुर की महिला पर्वतारोही प्रेमलता अग्रवाल ने दुनिया के सात महाद्वीपों के सर्वोच्च शिखर पर तिरंगा लहराने का अनूठा कारनामा कर दिखाया है।
विज्ञापन


यह उपलब्धि हासिल करने वाली वह पहली भारतीय महिला हैं।

50 वर्षीय और दो बेटियों की मां प्रेमलता ने गत 23 मई को उत्तरी अमेरिका के अलास्का स्थित सर्वोच्च शिखर माउंट मैककिनले (6194 मी) को फतह किया और इसके साथ ही उन्होंने सात महाद्वीपों की सबसे ऊंची चोटियों पर पहुंचने का अद्भुत रिकॉर्ड बना दिया।

प्रेमलता का स्वदेश वापसी पर शुक्रवार को राजधानी में भव्य स्वागत किया गया और इस दौरान उन्होंने अपने रोमांचक सफर के अनुभव भी साझा किए।

प्रेमलता ने कहा, ‘मैं एक हाऊसवाइफ थी और अब भी हूं। लोगों का यह मानना है कि 40 वर्ष के बाद भारतीय महिलाएं कुछ नहीं कर सकती लेकिन मैं लोगों की इसी सोच को बदलना चाहती थी।
विज्ञापन


मुझे खुशी है कि मैंने वह कारनामा किया है जिससे लोग अपनी यह संकीर्ण सोच बदलने पर मजबूर हो जाएंगे। मेरी यह सफलता अकेले की नहीं है।

मेरे परिवार के सदस्यों, मेरे ससुरालवालों, पति विमल अग्रवाल और दोनों बेटियों, टाटा स्टील और मेरे पिछले अभियान के प्रायोजक नंदलाल यंगटा को जाता है जिन्होंने मुझे अभूतपूर्व सहयोग दिया जिसके कारण मैं इस मुकाम तक पहुंच सकी।’

...यूं शुरू हुआ सफर
प्रेमलता का सात महाद्वीपों की शीर्ष चोटियों को फतह करने का रोमांचक सफर छह जून 2008 को अफ्रीका में किलिमंजारो (5895 मीटर) पर जीत हासिल करने के साथ शुरू हुआ था। प्रेमलता ने फिर 20 मई 2011 को एशिया और दुनिया के सर्वोच्च शिखर माउंट एवरेस्ट (8848 मी) को फतह किया।

पद्मश्री से सम्मानित प्रेमलता ने 10 फरवरी 2012 को दक्षिण अमेरिका के एकोनकागुआ (6962 मी), 12 अगस्त 2012 को यूरोप के एल्ब्रास (5642 मी), 22 अक्तूबर 2012 को ऑस्ट्रेलिया ओसनिवा के कार्सटेंस पिरामिड (4884 मी), 5 जनवरी 2013 को आंटार्टिका के विनसन मैसिफ (4892 मी) और 23 मई 2013 को उत्तरी अमेरिका के माउंट मैककिनले (6194 मी) को फतह किया।

बछेंद्री पाल हैं आदर्श
प्रेमलता बछेंद्री पाल को अपना आदर्श मानती हैं और अपनी इस उपलब्धि का श्रेय उन्हें देते हुए कहती हैं, ‘35 वर्ष की उम्र में मेरी बछेंद्री से मुलाकात हुई थी जिसके बाद मेरे जीवन का रुख ही बदल गया। मैंने एवरेस्ट को तब फतह किया था जब मेरी बड़ी बेटी की शादी हो गई थी। उसके बाद ही मैंने फैसला किया था कि मुझे सातों महाद्वीप के सर्वोच्च चोटियों को फतह करना है।’

आसान नहीं था सफर
अपने रोमांचक सफर के बारे में प्रेमलता ने कहा, ‘यह सब बहुत मुश्किल था। किसी जगह शून्य से 35 डिग्री कम तापमान था। कई जगह आठ-आठ जोड़े कपड़े पहनने पर भी ठंड कम नहीं होती थी।

कहीं पर पोर्टर नहीं मिलते थे और अपना वजन खुद ढोकर चलना पड़ता था। ओसनिया में कार्सटेंस की चढ़ाई सबसे मुश्किल थी। वहां तो हालत यह थी कि लगातार बारिश होती रहती थी। कई जगह कमर तक दलदल थी। पोर्टर नहीं थे और अपना सामान खुद ढोना पड़ता था। जंगलों में मच्छर भरे पड़े थे।

वर्षा के कारण पहाड़ पर फिसलन हो गई थी। वापसी में मेरे पैरों पर एक पत्थर गिर गया था और पैर में सूजन के साथ ही मुझे लौटना पड़ा था। तमाम परेशानियों के बावजूद मैं इन सब बातों को शिखर पर पहुंचने के बाद तिरंगा लहराते ही भूल जाती थी। तब मुझे लगता था कि मैंने अपने देश के लिए कुछ किया है।’

प्रेमलता जिद्दी किस्म की है। वह जो ठान लेती है उसे कर के दिखाती है। मुझे बड़ी खुशी और गर्व है कि मैं उनका पति हूं। मेरी नई पहचान तो अब प्रेमलता से बन गई है।
विज्ञापन

- विमल अग्रवाल, प्रेमलता के पति
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें