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राष्ट्रपति की किताब में खुलासा, इंदिरा को भारी पड़ी इमरजेंसी

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भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपनी किताब 'द ड्रेमेटिक डिकेड' में लिखा है कि साल 1975 में केंद्र सरकार द्वारा पूरे देश में इमरजेंसी लगाए जाने के फैसले को टाला जा सकता था। उन्होंने आगे लिखा है कि मूल अधिकारों के निलंबन, बड़े पैमाने पर की गई गिरफ्तारियों ने और प्रेस पर थोपी गई सेंसरशिप ने लोगों पर काफी बुरा असर डाला था।
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देश में उन विषम हालातों के दौरान इंदिरा गांधी की सरकार में मंत्री रह चुके प्रणब मुखर्जी ने हालांकि अपनी किताब में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में बनने वाले विपक्ष को भी नहीं बख्शा और उन्हें दिशाहीन बताया है। राष्ट्रपति ने अपनी किताब में आजादी के बाद भारत में जारी उथल पुथल भरे माहौल पर अपने विचार रखे हैं। प्रणब मुखर्जी की यह किताब हाल ही में जारी हुई है।

अपनी किताब में प्रणब मुखर्जी ने लिखा है कि इंदिरा गांधी साल 1975 में लगाई गई इमरजेंसी की अनुमति के लिए जरूरी संवैधानिक प्रावधानों से भली-भांति परिचित नहीं थीं। उन्होंने कहा कि सिद्धार्थ शंकर रे की राय के चलते ही इंदिरा ने इमरजेंसी का फैसला लिया था।
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तीन खंडों में है प्रणब की 321 पन्नों की किताब

प्रणब मुखर्जी के मुताबिक दिलचस्प रूप से रे (पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री) वही शख्स थे जिन्होंने शाह कमीशन के आगे इमरजेंसी पर जबावदेही को लेकर अपने रूख को बदलते हुए इस फैसले से खुद को पूरी तरह से अलग कर लिया था।

राष्ट्रपति ने हाल ही में अपना 79वां जन्मदिन मनाया है। उन्होंने बताया, 'द ड्रेमेटिक डिकेड' एक ऐसी किताब है जिसके पहले हिस्से में साल 1969 से लेकर 1980 तक की घटनाओं को शामिल किया गया है, किताब के दूसरे भाग में साल 1980 से 1998 तक की घटनाओं का समावेश है, वहीं मेरे राजनीतिक कैरियर के खात्मे तक यानी साल 1998 से 2012 तक की घटनाओं को तीसरे भाग में रखा गया है। मैं अपनी किताब के जरिए यह बात कह पाऊंगा कि तात्कालीन केंद्रीय कैबिनेट के किसी भी मंत्री को उस घटना के इतने गहरे असर का अंदाजा नहीं था।'

प्रणब मुखर्जी की इस 321 पेज की किताब में बांग्लादेश की मुक्ति, जयप्रकाश नारायण का आंदोलन और साल 1977 में इंदिरा गांधी की हार के पलों को क्रमबद्ध तरीके से लिखा गया है। साथ ही इसमें साल 1980 में इंदिरा की दोबारा केंद्र सरकार में वापसी का भी जिक्र है।
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