भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपनी किताब 'द ड्रेमेटिक डिकेड' में लिखा है कि साल 1975 में केंद्र सरकार द्वारा पूरे देश में इमरजेंसी लगाए जाने के फैसले को टाला जा सकता था। उन्होंने आगे लिखा है कि मूल अधिकारों के निलंबन, बड़े पैमाने पर की गई गिरफ्तारियों ने और प्रेस पर थोपी गई सेंसरशिप ने लोगों पर काफी बुरा असर डाला था।
देश में उन विषम हालातों के दौरान इंदिरा गांधी की सरकार में मंत्री रह चुके प्रणब मुखर्जी ने हालांकि अपनी किताब में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में बनने वाले विपक्ष को भी नहीं बख्शा और उन्हें दिशाहीन बताया है। राष्ट्रपति ने अपनी किताब में आजादी के बाद भारत में जारी उथल पुथल भरे माहौल पर अपने विचार रखे हैं। प्रणब मुखर्जी की यह किताब हाल ही में जारी हुई है।
अपनी किताब में प्रणब मुखर्जी ने लिखा है कि इंदिरा गांधी साल 1975 में लगाई गई इमरजेंसी की अनुमति के लिए जरूरी संवैधानिक प्रावधानों से भली-भांति परिचित नहीं थीं। उन्होंने कहा कि सिद्धार्थ शंकर रे की राय के चलते ही इंदिरा ने इमरजेंसी का फैसला लिया था।