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अहमियत ना मिलने से शिवसेना नाराज?

Wed, 28 May 2014 11:47 AM IST
वेद विलास उनियाल/अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल में शिवसेना केवल एक कैबिनेट मंत्री का पद हासिल कर पाई है। लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र में शानदार प्रदर्शन के बाद शिवसेना अपेक्षा कर रही थी कि उसे गंठबंधन में खासी तवज्जो मिलेगी। मोदी मंत्रिमंडल में सदस्यों की संख्या कम होने के बावजूद शिवसेना के दो या तीन कैबिनेट मंत्री होंगे।
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शिवसेना की कोशिश अपने पांच सांसदों को मंत्रिमडल में शामिल करवाने की थी। लेकिन उसे उतनी ही अहमियत मिली जितनी कि बिहार में लोजपा को दी गई। खासकर जब चार महीने में ही महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव होने है, तब भाजपा के जरिए शिवसेना को अहमियत नहीं देना कई सुगबुगाहट पैदा करता है।

लोकसभा चुनाव में राज्य की 48 सीटों में भाजपा को 23 और शिवसेना को 18 सीटें मिली हैं। इस लहर में कांग्रेस और राकांपा मराठवाड़ा, पश्चिम महाराष्ट्र, विदर्भ हर क्षेत्र में साफ हो गई। कांग्रेस केवल नांदेड़ और हिंगोली की सीट जीत सकी। एनसीपी के हिस्से में केवल चार सीटें आई।
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सफलता पर शिवसेना-भाजपा में मतभेद

भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना अब इस सफलता को अलग-अलग पैमाने से देख रही है। भाजपा खेमा प्रचारित कर रहा है कि मोदी लहर का शिवसेना को जबर्दस्त फायदा हुआ है। साथ ही भाजपा का यह भी मानना है कि राज ठाकरे को किसी तरह साध कर रखा गया।

वरना मनसे अगर पूरी तैयारी के साथ चुनाव लड़ती तो शिवसेना को जगह-जगह नुकसान होता। लोगों ने शिवसेना को वोट इसलिए दिया कि वह किसी तरह मोदी को प्रधानमंत्री बनते हुए देखना चाहते थे। यहां तक कि राज ठाकरे भी बार-बार मोदी के प्रधानमंत्री बनने की बात करते रहे।

भाजपा के चलते उन्होंने अपने प्रचार अभियान को बहुत तूल नहीं दिया। जबकि शिवसेना का कहना है कि राज्य में उनके संगठन के आधार की वजह से यह सफलता मिली है। साथ ही लोगों ने शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे की याद में भी वोट दिए हैं।

चुनाव प्रचार के दौरान भी दिखी थी तनातनी

शिवसेना के नेता यह भी कह रहे हैं कि उनके जरिए राज्य में आरपीआई और दूसरे कुछ संगठनों को जोड़ा गया है। जिसमें राज्य के कई इलाकों में दलित और कमजोर जातियों के वोट गठबंधन को पड़े हैं। हालांकि रामदास आठवले ने जिन दो सीटों पर अपने दल के लोग खड़े किए थे, वो दोनों ही हार गए हैं। लेकिन फिर भी शिवसेना मान रही है कि इसका राज्य स्तर पर गठबंधन को फायदा हुआ है।

शिवसेना और भाजपा के बीच में थोड़ी तनातनी बनी हुई है। चुनाव प्रचार के दौरान भी शिवसेना ने कई बार ऐसे संकेत दिए कि वह पूरी तरह भाजपा या उसके नेता नरेंद्र मोदी के प्रभाव में नहीं है। पहले भाजपा के जरिए मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने पर शिवसेना बहुत उत्साह से उनके पीछे खड़ी होते नहीं दिखी।

इसके बाद मनसे को लेकर कई बार शिवसेना ने गठबंधन को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए। यह तक कहा जाने लगा कि भाजपा शिवसेना या राज ठाकरे में किसी एक को चुन ले। इसके बाद शिवसेना के मुखपत्र 'सामना' में महाराष्ट्र में गुजराती लोगों पर टिप्पणी करके शिवसेना ने कुछ सनसनी फैलाई। लेकिन इन सब स्थितियों के बाद भी गठबंधन पर आंच नहीं आई और दोनों पार्टियों ने गठबंधन में चुनाव लड़कर शानदार सफलता प्राप्त की। विवाद यही नहीं थमा।
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विधानसभा चुनाव में भाजपा की दावेदारी

चुनाव परिणाम आते ही जहां टीडीपी, अकाली दल जैसे दूसरे दलों ने मंत्रिमंडल में अपनी भागेदारी को लेकर चुप्पी बनाए रखी, वहीं शिवसेना ने जोरशोर से अपनी हैसियत और दावा जताना शुरु कर दिया। यह बात अलग है कि नरेंद्र मोदी ने शिवसेना को केवल एक ही जगह दी। कहा तो यह भी जा रहा है कि पहले शिवसेना की तरफ से किसी और सांसद का नाम मंत्रिमंडल के लिए प्रस्तावित था। लेकिन यहां भी भाजपा ने पद और अनुभव के लिहाज से अनंत गिते के नाम पर सहमत कराया।

अब महाराष्ट्र में सारी उठापटक विधानसभा चुनाव को लेकर हो रही है। लोकसभा में चित्त होकर बैठी कांग्रेस राकांपा के लिए सत्ता में वापसी काफी कठिन लगती है। अब तक भाजपा शिवसेना विधानसभा चुनाव में शिवसेना 169 और भाजपा 119 सीटों पर चुनाव लड़ती है। लोकसभा में इसके उलट भाजपा अधिक सीटों पर चुनाव लडती है।

इस बार मोदी लहर और केंद्र में भाजपा की अपने दम पर बहुमत खड़ा कर देने से महाराष्ट्र में भाजपा में शिवसेना से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने की मांग उठ रही है। भाजपा की कोशिश है कि मुख्यमंत्री भले शिवसेना का हो लेकिन सदन में उनके विधायकों की संख्या अच्छी खासी हो। इसलिए चुनाव से पहले अपने अपने पांसे फेंके जा रहे हैँ।
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