व्यापमं के घोटाले में 10 वें आरोपी राज्यपाल राम नरेश यादव आज भले सबकी निगाह में गलत हों लेकिन एक ऐसा भी वक्त था जब राजनीति में लोग उनकी ईमानदारी की दुहाई दिया करते थे।
लोकदल, फिर जनता पार्टी, और चौधरी चरण सिंह के चहेते बन कर उनकी सरपरस्ती में अपने राजनैतिक जीवन की आश्चर्यजनक शुरुआत करने वाले राम नरेश यादव ने इमरजेंसी के बाद जब जनता पार्टी के हाथों तात्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की करारी हार हुई थी, उसी दौर में वो सबके चहेते बन गए थे।
राम नरेश आजमगढ़ से पहली बार लोक सभा में गए तो फिर उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। चौधरी चरण सिंह ने राम नरेश से प्रभावित होकर लगातार 3 बार से विधायक रहे मुलायम सिंह यादव को नजर अंदाज कर के 1977 में राम नरेश यादव को संयुक्त उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया लेकिन उन्हें दो साल के भीतर ही अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी।
इसलिए गई मुख्यमंत्री की कुर्सी
यूं तो चरण सिंह राम नरेश यादव को लंबी रेस का घोड़ा मानते थे लेकिन यादव के इस्तीफे के बाद खाली पड़ी आजमगढ़ लोक सभा सीट पर उपचुनाव में मोहसिना किदवई ने जनता पार्टी के कैंडिडेट को बुरी तरह हराया और कांग्रेस की जीत ने इस बात के भी संकेत दिए की इंदिरा की आंधी जो चिकमंगलूर से चल चुकी थी,जो जल्द ही पूरे देश पर छाने वाली है।
आजमगढ़ उपचुनाव में मिली करारी हार के बाद राम नरेश को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। जिसके बाद जनता पार्टी ने अपना डैमेज कंट्रोल करने के लिए बनारसी दास को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिया।
कभी चरण सिंह यूथ ब्रिगेड के सदस्य रहे जदयू नेता केसी त्यागी के मुताबिक ''आजमगढ़ की हार चौधरी चरण सिंह के लिए बहुत ही चौंकाने वाली थी, जिसने राम नरेश यादव से उनकी मुख्यमंत्री की कुर्सी छीन ली।
राजनारायण के बने करीबी
आजमगढ़ की हार ने चौधरी चरण सिंह को ये भी एहसास कराया कि मुलायम सिंह की अनदेखी कर राम नरेश यादव को मुख्यमंत्री बनाना उनकी बड़ी भूल थी। राम नरेश ने जब मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया तो उसके बाद वो रिक्शे से अपने घर वापस गए।''
चरण सिंह के लिए अपना विश्ववास खो चुके राम नरेश यादव धीरे-धीरे राज नरायण के करीबी बन गए जो खुद एक बागी थे। राजनीति में खासा मोड़ तब आया जब राम नरेश यादव मुलायम सिंह यादव का मुकाबला करने के लिए चरण सिंह के बेटे अजीत सिंह की बनाई पार्टी में शामिल हो गए और यही वह वक्त था जब वो कांग्रेस में शामिल होने के लिए प्रेरित हुए।
2009 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने राम नरेश यादव का सावधानी से इस्तेमाल किया जिसके बाद पार्टी की तरफ से उन्हें इसका फल भी मिला। राम नरेश को कांग्रेस ने राज्यसभा में पहुंचा दिया और फिर उन्हें कांग्रेस कार्यसमिति की सदस्यता भी मिल गई। पार्टी ने उन्हें यादवों के बीच कैंपेन करने की भी जिम्मेदारी दी।
2011 में बने राज्यपाल
2011 में जब कांग्रेस उत्तर प्रदेश लोक सभा चुनावों के लिए अपनी तैयारी कर रही थी, उसी दौरान राम नरेश को मध्य प्रदेश का राज्यपाल बना दिया गया।
राम नरेश यादव से पूर्व में जुड़े एक नेता ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बताया अगर हाल के व्यापम घोटाले को एक किनारे रख कर देखें तो राम नरेश भारतीय राजनीति के ऐसे नेता थे, जिन्हें हर पार्टी में लोग उनकी ईमानदारी और साफगोई के लिए जानते थे लेकिन राजभवन के आस पास के लोगों ने उन्हें व्यापम घोटाले में लाचार बना दिया है।
व्यापम घोटाले में मुख्यमंत्री शिवराज सिहं के लिए मुसीबत बन चुके यादव को देख कर कांग्रेस खुश है। कांग्रेस का मानना है कि शिवराज ने राज्यपाल राम नरेश को अब तक इसलिए बचाए रखा ताकि वे सुरक्षित रह सकें।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल रामनरेश यादव को नोटिस देते हुए चार हफ्ते के भीतर जवाब मांगा है। वहीं इस मामले पर कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह का कहना है कि राज्यपाल को तभी इस्तीफा दे देना था, जब उन पर पहली बार एफआईआर दर्ज हुई थी।