लाल किले की प्राचीर से नरेंद्र मोदी का पहला भाषण, क्या वो भाषण था जिसका इस देश की जनता इंतज़ार कर रही थी? क्या ये भाषण उन भाषणों से अलग था जो उन्होंने चुनाव के दौरान लाल किले की नकली प्राचीरों से दिए थे? शायद हां और शायद नहीं।
हां इसलिए, क्योंकि प्रधानमंत्री के तौर पर जिस आत्मविश्वास की उम्मीद उनसे थी, उस पर वे खरे उतरते दिखते हैं। कम से कम 23 वर्षों बाद देश ने एक ऐसा प्रधानमंत्री देखा जो सीधी रीढ़ के साथ सीधे, सधे और तेज कदमों से चलकर लाल किले की प्राचीर पर चढ़ सकता है और इसके बाद अपने देशवासियों से सीधे संवाद करने के अंदाज में अपनी बात कह सकता है। कम से कम दस वर्ष बाद एक प्रधानमंत्री शब्द दर शब्द कागज के पन्ने नहीं पढ़ रहा था, भाषण दे रहा था।
उनसे संघीय ढांचे को लेकर जिस व्यापक दृष्टि की अपेक्षा की जाती है, वह उनके भाषण में दिखाई देती है। उन्होंने राज्य सरकारों को साथ लेकर चलने और विकास में उनकी भागीदारी की बात एकाधिक बार कही जो एक सकारात्मक संकेत देती है।
प्रधानमंत्री में एक अच्छे प्रशासक के रूप में जिस अंतरदृष्टि की जरूरत होती है वह उनके भाषण से झलकती है और इसी वजह से अपने ढाई महीने के कार्यकाल को एक 'इनसाइडर' की तरह देखते हैं और नौकरशाहों को साफ संकेत देते हैं कि वे आपसी खींचतान को ख़त्म करें। साथ ही वे सरकारी नौकरी कर रहे लोगों को 'सर्विस' यानी सेवा की खत्म होती अवधारणा के प्रति आगाह करते हैं।
वे सभी को साथ लेने की न केवल बात करते हैं बल्कि इसके लिए आवश्यक सावधानियां भी बरतते हैं। वे प्राचीर से महात्मा गांधी, लाल बहादुर शास्त्री, जयप्रकाश नारायण, अरविंद, विवेकानंद और सरदार पटेल का नाम तो लेते हैं लेकिन उन नामों को सुविचारित ढंग से छोड़ देते हैं जिनको लेकर समाज में एकरूप सहजता नहीं हैं। चाहे वो श्यामाप्रसाद मुखर्जी हों या वीर सावरकर।
वे जातिवाद और सांप्रदायिकता की लड़ाई से निकलकर आगे बढ़ने की बात भी करते हैं। वे पाकिस्तान और कश्मीर का जिक्र नहीं करते बल्कि सार्क देशों के साथ मिलकर गरीबी से लड़ने की बात करते दिखते हैं। देश के संरक्षक के रूप में वे न केवल उद्योग और व्यापार को बढ़ाने की बात करते हैं बल्कि गरीबी को मिटाने का संकल्प लेते हैं और दोनों के लिए अपना दृष्टिकोण भी रखते हैं।
'एक गति-एक मति' जैसा नारा देकर वे लुभाते हैं यह कहकर कविता भी रचते दिखते हैं कि देश का हर नागरिक यदि एक कदम उठाएगा तो सवा सौ करोड़ कदम आगे बढ़ेंगे।
प्रचारक का प्रवचन
लेकिन क्या नरेंद्र मोदी का इतना कह देना पर्याप्त था? क्या उनसे इतने भर की उम्मीद थी? यकीनन नहीं।
उनसे पहली उम्मीद थी कि वे असली प्राचीर पर खड़े होकर राजनीति को भुला देंगे लेकिन उन्होंने अपने भाषण की पहली कुछ पंक्तियों में ही पूर्ववर्ती सरकारों को उलाहना दे दिया कि उन्होंने सरकारी विभागों की कार्यशैली को ध्वस्त कर रखा है। इसमें चाहे विभागों के बीच की खींचतान हो या फिर समय पर दफ्तर न पहुंचने की समस्या। बाद में पूर्व सरकारों और प्रधानमंत्रियों को देश की उन्नति का श्रेय देकर वे इन जख्मों पर मरहम नहीं लगा सकते।
एक विश्लेषक की तरह सुदीप श्रीवास्तव की ये बात ठीक लगती है कि अगर आप सरकार की ओर से की गई घोषणाओं को एक क्षण के लिए भूल जाएं और आंख मूंद कर इस भाषण को सुनें तो यह संस्कार और संस्कृति पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक प्रचारक के प्रवचन की तरह दिखता है।
इसमें मां-बाप के लिए बेटों को संभालकर रखने की और डाक्टरों के लिए पैसों की खातिर कोख में बेटियों को न मारने की हिदायतें हैं। इसमें सांप्रदायिकता और जातिवाद से ऊपर उठने की नसीहत तो है लेकिन कोई ऐसी ठोस चेतावनी नहीं है कि सरकार इसके प्रति कोई सख्त कदम उठाने जा रही है।
प्रधानमंत्री के भाषण में माओवादी और बलात्कार हिंसा के खिलाफ बातें तो हैं लेकिन देश की इस बड़ी समस्या के समाधान की ओर किसी ठोस योजना की बजाय मां-बाप को संस्कारवादी नसीहतें हैं। और साथ में बेटों पर बेटियों की तरह रोक-टोक के संकेत भी। बेटियों को बेरोकटोक जीने देने का जज़्बा नदारद।
वे राजनीति की जगह जब राष्ट्रनीति की बात करते हैं तो लगता है कि वे पिछले ढाई महीनों की अपनी सरकार के कामकाज को अनदेखा करते हुए एक काल्पनिक स्थिति की बात कर रहे हैं। वे नेता प्रतिपक्ष का पद किसी दल को न देने की पहल करती सरकार के मुखिया होकर भी नेता प्रतिपक्ष की भूमिका के महत्व को रेखांकित करते हैं।
उम्मीदों पर खरा न उतरने की धारणा के पीछे एक सबसे बड़ी वजह यह भी है कि उन्होंने उन मुद्दों को अनछुआ सा रख दिया जिसके आधार पर नरेंद्र मोदी 'अच्छे दिनों' का वादा कर रहे थे।
लाल किले की नकली प्राचीर से दिए गए उनके भाषणों में तीन प्रमुख मुद्दे थे। एक भ्रष्टाचार, दूसरा महंगाई और तीसरा काला धन।
असली प्राचीर से उन्होंने 'इसमें मेरा क्या? और इससे मुझे क्या?' वाली बात कही तो लगा कि वे भ्रष्टाचार पर कुछ ठोस बात कहेंगे लेकिन यह भी संघ के संभाषणों की तरह देश सेवा से जुड़ी बात होकर रह गई।
महंगाई से जूझ रही देश की जनता के लिए राहत का कोई सुराग देने की बात तो दूर उन्होंने इसका जिक्र तक नहीं किया। काले धन का मुद्दा मानों एसआईटी के गठन के बाद खत्म ही हो गया है। 15 अगस्त के नरेंद्र मोदी की भाषण से भी यह विषय नदारद रहा।
लाल किले की प्राचीर एक अवसर देती है कि प्रधानमंत्री अपने आपको सर्वोच्च पद पर जा पहुंचे एक राजनीतिक से एक 'स्टेट्समैन' में तब्दील कर ले लेकिन ऐसा लगता है कि नरेंद्र मोदी पांच में से पहला अवसर तो इस बार चूक गए हैं।