प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने विश्वविद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता पर चिंता जताते हुए कहा कि हमारे अधिकतर उच्च शिक्षा संस्थान अपेक्षित स्तर के नहीं है। ज्यादातर विश्वविद्यालय हाल के वर्षों में दुनिया में तेजी से हुए बदलाव के अनुरूप खुद को बदल नहीं पाए हैं। इनमें अभी भी ऐसे विषयों में स्नातक तैयार किए जा रहे हैं, जिनकी रोजगार के बाजार में कोई मांग नहीं है।
प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति भवन में केंद्रीय विश्वविद्यालयों के कुलपतियों के सम्मेलन में यह बात कही। मनमोहन ने पिछले दस सालों में देश में बड़ी संख्या में उच्च शिक्षण संस्थाओं की स्थापना की जिक्र करते हुए कहा कि मांग के अनुरूप विस्तार जरूरी है। लेकिन गुणवत्ता में सुधार लाए बिना इसका कोई लाभ नहीं होगा।
उन्होंने कहा कि हमारे लिए यह गंभीर सोच का विषय है कि विश्व के शीर्ष 200 विश्वविद्यालयों में भारत का एक भी विश्वविद्यालय शामिल नहीं है। हमें अपने संस्थानों में लचीलापन लाकर अच्छे शिक्षकों को आकर्षित करना होगा। इससे शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार तथा आधुनिक अनुसंधान को प्रोत्साहन मिल सकेगा।
प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति की ओर से आयोजित कुलपतियों के इस सम्मेलन की तारीफ करते हुए उम्मीद जताई कि सम्मेलन के अंत में कुछ ऐसी सिफारिशें सामने आएंगी जिससे शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार किया जा सके। उन्होंने कहा कि केंद्रीय विश्वविद्यालय देश में उच्च शिक्षा के मानक स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
उच्च शिक्षा में बौद्धिक पलायन रोकना जरूरी: राष्ट्रपति
राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने देश के उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रमुख शैक्षणिक एवं अनुसंधान पदों पर प्रतिभा की कमी को एक बड़ी चुनौती के रूप में लिए जाने की जरूरत पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि हमें बौद्धिक पलायन रोकना होगा। ऐसे संस्थानों की नीति बनाते समय उन्हें ज्यादा स्वायत्तता एवं बेहतर प्रशासन देना होगा।
राष्ट्रपति ने कहा कि शिक्षण संस्थानों को गुणी शिक्षकों को आकर्षित करने तथा लंबी अवधि तक उन्हें रोके रखने के लिए सेवा शर्तों में बदलाव तथा विभिन्न प्रोत्साहन देने होंगे। उन्होंने उच्च शिक्षा में निजी क्षेत्रों की भागीदारी बढ़ाने पर भी जोर दिया।