पांच राज्यों के एक्जिट पोल के नतीजे देखने के बाद सरकार अब संसद के शीतकालीन सत्र की बैठकें बढ़ाने के मूड में नहीं है। हालांकि भाजपा व लेफ्ट समेत विपक्ष सत्र की बैठकें बढ़ाए जाने को लेकर दलीलें दे रहे हैं।
संविधान विशेषज्ञ भी मानते हैं कि मौजूदा सत्र को जनवरी तक विस्तार देने में संवैधानिक तौर पर कोई अड़चन नहीं है, लेकिन महंगाई से चौतरफा घिरी सरकार के मूड से साफ है कि शीतकालीन सत्र मात्र 12 बैठकों तक सिमट जाएगा। ऐसा होने पर यह सत्र सबसे कम बैठकों का एक नया रिकार्ड भी कायम करेगा।
यह सत्र पिछले मानसून सत्र की मात्र 21 बैठकों का रिकार्ड तोड़ने जा रहा है। सरकार ने तब मानसून सत्र की 16 बैठकें ही तय की थीं, लेकिन ज्यादा विधायी कार्य के चलते पांच दिन और बढ़ा दिए गए।
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अब सरकार की दलील है कि पांच राज्यों के चुनाव के कारण सत्र देर से बुलाया गया और अब क्रिसमस के चलते इसे दिसंबर के आखिरी सप्ताह में बढ़ाना उचित नहीं होगा, जबकि जनवरी में राष्ट्रपति के अभिभाषण के बाद ही नया सत्र शुरू होता है, इसलिए इसे आगे बढ़ा पाना संभव नहीं है।
लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार के साथ सर्वदलीय बैठक में भी सरकार यही दलील देती रही। बृहस्पतिवार को राज्यसभा की कार्यमंत्रणा समिति की बैठक में भी कमोबेश यही तर्क दिए गए। हालांकि लोकसभा के पूर्व महासचिव सुभाष कश्यप कहते हैं कि सत्र को जनवरी तक विस्तार देने में संवैधानिक तौर पर कोई भी बाधा नहीं है।
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पहले भी एक बार ऐसा हो चुका है। उन्होंने कहा कि कानून में साफ कहा गया है कि नए साल में जब भी नया सत्र शुरू होगा उसे ही राष्ट्रपति संबोधित करते हैं। माकपा नेता सीताराम येचुरी के अनुसार, 2004 में शीतकालीन सत्र जनवरी तक बढ़ाया गया था।
बहरहाल, संसद के रिकार्ड गवाह हैं कि नेहरू के जमाने में हमेशा 100 से ज्यादा बैठकें होती रही हैं, लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी के शुरुआती वर्षों में भी यह क्रम जारी रहा। लेकिन वर्ष 1975 से इनमें कमी आने लगी।
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मोरारजी देसाई व व राजीव गांधी के कार्यकाल में कई बार सौ बैठकें हुईं। लेकिन पिछले तीन दशकों के दौरान सालभर में एक बार भी संसद की सौ बैठकें नहीं हुईं। जबकि अखिल भारतीय स्पीकर्स फोरम की सिफारिश रही है कि संसद और बड़े राज्यों में विधानसभाओं की साल में कम से कम 100 तथा छोटे राज्यों में 60 बैठकें होनी चाहिए।
संसद की बैठकों को लेकर यूपीए व एनडीए एक समान
संसद की बैठकें बुलाने के मामले में यूपीए और एनडीए का रिकार्ड एक जैसा रहा है। यूपीए की पहली पारी में 2008 के दौरान सालभर में मात्र 46 बैठकें हुईं, जो कि आजादी के बाद एक साल में सबसे कम बैठकें होने का नया रिकार्ड है। एनडीए के शासन में अधिकतम 87 व न्यूनतम 51 बैठकें हुईं थीं। यूपीए की पहली पारी में 53 से 82 तक बैठकें हुईं, जबकि दूसरी पारी में यह औसत मात्र 52 बैठकों का है।