पिछले साल 16 दिसंबर को दिल्ली में चलती बस में हुई गैंगरेप की पीड़िता के माता-पिता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। उन्होंने अदालत से एक आरोपी के खिलाफ निर्देश जारी करने का आग्रह किया है जो नाबालिग है।
परिजनों का कहना है कि इस आरोपी को जुवेनाइल की श्रेणी में रखने वाले कानून को रद्द किया जाए और आपराधिक अदालत में आरोपी के खिलाफ ट्रायल चलाया जाए।
जिस समय यह घटना हुई थी उस समय उसकी उम्र 18 साल से मात्र छह महीने कम थी। उसे 23 साल की लड़की की हत्या और गैंगरेप के मामले में दोषी करार दिया गया है और जुवेनाइल कानून के तहत तीन साल का कारावास की सजा मिली है।
पीड़िता के परिजनों ने सर्वोच्च अदालत से कहा है कि 31 अगस्त को जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड की ओर से जारी किया गया फैसला उन्हें स्वीकार नहीं है।
उनकी याचिका में जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है। चूंकि इस मामले में किसी अन्य प्राधिकरण से उन्हें राहत उम्मीद नहीं है इसलिए सीधे तौर पर शीर्षस्थ अदालत में याचिका दायर की गई है।
पीड़िता के पिता बद्रीनाथ सिंह और मां आशा देवी ने याचिका में सर्वोच्च अदालत से जुवेनाइल जस्टिस एक्ट को असंवैधानिक और अवैध करार दिए जाने का निर्देश जारी करने का आग्रह किया है।
क्योंकि यह आपराधिक अदालतों से भारतीय दंड संहिता की धाराओं के तहत आने वाले नाबालिग अपराधियों के खिलाफ ट्रायल चलाने की शक्ति छीनता है।
याद रहे कि यह किशोर उन छह लोगों में शामिल था जिन्होंने गत वर्ष 16 दिसंबर की रात दिल्ली में चलती में 23 वर्षीय एक लड़की से सामूहिक और बर्बर बलात्कार किया था।
पीड़िता की 29 दिसंबर को सिंगापुर के एक अस्पताल में मौत हो गई थी।