पेपर आउट होने के बाद पीसीएस-2015 प्री की पहली पाली की परीक्षा तो निरस्त कर दी गई लेकिन इतने बड़े पैमाने पर हुई गड़बड़ी के लिए 24 घंटे बाद भी उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग और संबंधित विभाग के अफसरों की कोई जवाबदेही तय नहीं की गई। महज एक परीक्षा केंद्र के इर्दगिर्द घूम रही जांच इस बात के संकेत दे रही है कि कहीं न कहीं अफसरों को बचाने की कवायद शुरू हो गई है और आयोग को भी क्लीन चिट देने की पूरी तैयारी है।
अगर पेपर आउट होने की घटना के सुबूत सामने न आते तो इस बात की उम्मीद बहुत कम थी कि आयोग पहली पाली की परीक्षा निरस्त करता। पहले दिन तो आयोग के अफसरों ने माना ही नहीं कि पेपर आउट हुआ है। मामला मुख्यमंत्री तक पहुंचा और पेपर आउट होने के सुबूत सामने आए तो खुद को चौतरफा घिरा देख 24 घंटे बाद सोमवार को आयोग की ओर से तीन सदस्यीय टीम गठित कर जांच कराई गई और इस पूरे मामले में लखनऊ स्थित एक परीक्षा केंद्र को दोषी माना गया।
कार्रवाई के नाम पर अब सिर्फ परीक्षा केंद्र पर निशाना साधा जा रहा है जबकि जानकारों का कहना है अफसरों की मिलीभगत के बगैर इतनी बड़ी गड़बड़ी को अंजाम देना मुमकिन नहीं। सेंटर पर भी परीक्षा से आधा घंटा पहले पेपर का बंडल खुलना चाहिए जबकि प्रश्नपत्र डेढ़ घंटे पहले ही बाहर आ गया था। सवाल यह भी है कि इतनी जल्दी पेपर की बोली कैसे लग गई। इसके अलावा भी तमाम सवाल हैं, जो इस पूरे मामले में आयोग की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं।
आयोग के अध्यक्ष की नियुक्ति पर ही सवाल
विवाद का पर्याय बन चुके उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष डॉ.अनिल यादव के चयन पर ही सवाल बना हुआ है। उन पर तथ्य छिपाकर इस पद के लिए दावेदारी का आरोप है तो कई आपराधिक मुकदमों में भी उनका नाम शामिल होने की बात आई है। इस संबंध में पूछे गए आरटीआई का जवाब कई महीनों बाद भी आईजी आगरा और शासन की ओर से नहीं उपलब्ध कराया जा सका है।
इतना ही नहीं चयन में इन्हें कई वरिष्ठ प्रोफेसर, आईएएस, आईपीएस अधिकारी, मेजर जनरल आदि पर वरीयता दी गई जबकि दावेदारों की सूची में इनका नाम सबसे नीचे था। अभ्यर्थियों की ओर से हाईकोर्ट में इनके खिलाफ दायर जनहित याचिका में इन तथ्यों को आधार बनाते हुए चेयरमैन के पद से उन्हें हटाने तथा उनके कार्यकाल में की गई नियुक्तियों की जांच सीबीआई से कराने की मांग की गई थी।
हालांकि कोर्ट ने उन्हें हटाए जाने की मांग पर हस्तक्षेप नहीं किया और सिर्फ जांच की मांग पर विचार करने के लिए आयोग से जवाब मांगा है। बता दें, डॉ.अनिल यादव, मैनपुरी के चित्रगुप्त महाविद्यालय में बतौर प्रवक्ता नियुक्त हुए थे। बाद में वहीं प्राचार्य बनाए गए लेकिन हाईकोर्ट ने 2011 में उनकी इस तैनाती को रद कर दिया था। हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट से उन्हें राहत भी मिल गई। डॉ.अनिल यादव के खिलाफ आगरा के चार थानों में आपराधिक मुकदमें हैं। इसमें गुंडा ऐक्ट भी शामिल है।
चार थानों में दर्ज हैं मुकदमें
प्रतियोगी अवनीश पांडेय की ओर सभी मुकदमों के बारे में आरटीआई के तहत आईजी और शासन से एक वर्ष पहले जानकारी मांगी गई थी। खास यह कि आईजी की ओर से उक्त चारों थानों को छोड़कर शेष थानों से जुड़ी जानकारी दी गई है कि वहां उनके खिलाफ कोई मुकदमा नहीं है। आरटीआईकर्ता अवनीश की ओर से दो बार फिर जानकारी मांगी गई लेकिन जवाब नहीं मिला। अब उन्होंने राज्य सूचना आयुक्त के पास अपील की है।
डॉ. अनिल यादव का बतौर सदस्य छह वर्ष का कार्यकाल नवंबर 2012 में पूरा हुआ। इसके चार महीने बाद दो अप्रैल 2013 को उन्हें बतौर अध्यक्ष तैनात कर दिया गया। इसके लिए कुल 83 दावेदारों की सूची में डॉ.अनिल आखिरी नंबर पर थे। इनमें कई की प्रोफाइल काफी मजबूत थी लेकिन सब पर उन्हें प्राथमिकता दी गई। डॉ.अनिल पर सदस्य रहते हुए चिकित्साधिकी पद पर भर्ती में एक महिला अभ्यर्थी को लाभ पहुंचाने का भी आरोप है।
उक्त अभ्यर्थी को महिला आरक्षण का लाभ दिया गया, जबकि वह उत्तर प्रदेश की निवासी नहीं थीं। उन्होंने फार्म में पंजाब का पता दिया था। इतना ही नहीं बाद में उस अभ्यर्थी का पीसीएस-2013 की प्रारंभिक परीक्षा के लिए आखिरी समय में केंद्र बदले जाने की भी शिकायत है। इसके खिलाफ याचिका भी दाखिल की गई है। अभ्यर्थियों ने आरटीआई के तहत भी इस बारे में जानकारी मांगी है लेकिन कोई जवाब नहीं आया। सूत्रों के मुताबिक उक्त महिला अभ्यर्थी, प्रदेश सरकार में खास दखल रखने वाले एक परिवार की बहू है।
हजारों अभ्यर्थी बिना परीक्षा दिए ही हुए बाहर
उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की पीसीएस-2015 के हजारों अभ्यर्थी बिना परीक्षा दिए ही बाहर हो गए हैं। आयोग ने दूसरी पाली की परीक्षा निरस्त नहीं की है। जबकि, पेपर आउट और परीक्षा स्थगित होने की सूचना के बाद बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों ने दूसरी पाली की परीक्षा छोड़ दी। ऐसे में आयोग के इस फैसले से इन्हें इस अवसर से वंचित होना पड़ेगा। इसके नाराज अभ्यर्थी दोनों पालियों की परीक्षा निरस्त करने की मांग को लेकर आंदोलनरत हैं।
पहली पाली का पेपर आउट होने की सूचना सुबह से ही न्यूज चैनलों पर आने लगी थी। डीजीपी की ओर से परीक्षा निरस्त करने का प्रस्ताव भेजे जाने के बाद यह सूचना भी प्रसारित हो गई कि परीक्षा रद कर दी गई है। इसके बाद बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों ने दूसरी पाली की परीक्षा छोड़ दी। चूंकि सभी अभ्यर्थियों का सेंटर दूसरे जिलों में था, इसलिए जल्दी घर पहुंचने तथा बस और ट्रेन में भीड़ से बचने के लिए भी उन्होंने वापस होने में तत्परता दिखाई।
इसके विपरीत आयोग ने पेपर आउट होने की बात सिरे से खारिज कर दी और परीक्षा निरस्त करने से भी इंकार कर दिया। अब चौतरफा दबाव के बाद आयोग ने सोमवार को सिर्फ पहला पेपर स्थगित किया है। इसकी वजह से दूसरी पाली की परीक्षा छोड़ने वाले अभ्यर्थियों को प्रदेश की सबसे प्रतिष्ठित इस भर्ती से वंचित होना पड़ेगा।
पेपर आउट के विरोध में उग्र प्रदर्शन
पीसीएस-2015 प्रारंभिक परीक्षा का पेपर आउट होने के विरोध में प्रतियोगियों और छात्रों ने सोमवार को उग्र प्रदर्शन किया। नाराज प्रतियोगियों ने पहले एक बस में तोड़फोड़ की और फिर आग लगा दी। अभ्यर्थियों ने उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के दफ्तर, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, लक्ष्मी टाकीज चौराहा समेत कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन किया।
इस दौरान उन्होंने आयोग अध्यक्ष का पुतला भी दहन किया। साथ ही आंदोलनकारियों ने कटरा में लक्ष्मी टाकीज चौराहे पर केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह का भी पुतला फूंका। एबीवीपी के कार्यकर्ताओं ने आयोग अध्यक्ष के पुतले की शव यात्रा भी निकाली। प्रतियोगियों ने मंगलवार को विवि छात्रसंघ भवन और बुधवार को दोबारा आयोग दफ्तर पर जुटने की घोषणा की है।
पहले से ही प्रतियोगियों के विरोध की आशंका के मद्देनजर आयोग और विश्वविद्यालय समेत हर संवेदनशील स्थान पर भारी संख्या में फोर्स मौजूद रही। प्रतियोगियों में आयोग अध्यक्ष के खिलाफ सबसे अधिक गुस्सा था। आंदोलनरत प्रतियोगी दोनों पाली की परीक्षा निरस्त करने और इसकी सीबीआई जांच की मांग के सथा अध्यक्ष को हटाए जाने की मांग पर अड़े थे।
विभिन्न मांगों को लेकर विश्वविद्यालय के डायमंड जुबली हॉस्टल के सामने सुबह 10.30 बजे ही छात्रों और प्रतियोगियों का जमावड़ा था। प्रदर्शन कर रहे छात्र अचानक उग्र हो गए और जेएनएनयूआरएम की बस रोक दी। पहले उन्होंने उसमें से यात्रियों को उतारा और फिर जमकर तोड़फोड़ की। उनका यह उग्र रूप देखकर यात्री सामान बस में ही छोड़कर भाग खड़े हुए। इसके बाद भी छात्र शांत नहीं हुए।
इसी बीच एक छात्र ने कहीं से पेट्रोल लाकर बस पर छिड़ककर आग लगा दी। भारी संख्या में फोर्स पहुंचने पर कुछ देर में ही आग बुझा दी गई, लेकिन तब तक बस की सीटें जल चुकी थीं। पुलिस के पहुंचने से पहले छात्र और प्रतियोगी भी भाग गए थे। कंडक्टर अनिल कुमार पाल की तहरीर पर डेढ़ सौ अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा लिखा गया है।
अध्यक्ष को हटाने, परीक्षा निरस्त करने तथा सीबीआई जांच की मांग को लेकर आयोग दफ्तर पर भी प्रतियोगियों का जमावड़ा हुआ। आयोग के सभी गेट पर सुबह से ही भारी संख्या में फोर्स मौजूद रही। इसकी वजह से प्रतियोगियों का आंदोलन सिर्फ प्रदर्शन तक सीमित रहा। प्रतियोगी जिला प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर वापस हो गए लेकिन इस बीच दो घंटे से अधिक समय तक गतिरोध बना रहा।
वहीं सैकड़ों प्रतियोगियों ने शाम को लक्ष्मी टाकीज चौराहे पर केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह व आयोग अध्यक्ष का पुतला दहन करने के बाद प्रदर्शन किया। इस दौरान आयोग अफसरों के खिलाफ नारेबाजी भी की गई। प्रदर्शनी, आंदोलन में अवनीश पांडेय, कौशल सिंह, इलाहाबद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष कुलदीप सिंह केडी, राणा यशवंत प्रताप सिंह, अमरेंदू सिंह, रजनीश सिंह, अयोध्या सिंह, दीपक मिश्रा आदि शामिल रहे।
एबीवीपी के कार्यकर्ताओं ने विश्वविद्यालय परिसर में प्रदेश सरकार के पुतले की शव यात्रा निकाली और छात्रसंघ भवन पर उसका दहन किया। शवयात्रा में शैलेंद्र मौर्या, भास्कर मिश्र, सनत मिश्र, सूरज दुबे आदि शामिल रहे। विश्वविद्यालय में आइसा से जुड़े छात्रों की हुई बैठक में प्रदेश सचिव सुनील मौर्या, अंतस सर्वानंद आदि ने आयोग अध्यक्ष को बर्खास्त करने की मांग की।
एनएसयूआई से जुड़े छात्रों ने भी छात्रसंघ भवन पर आयोग अध्यक्ष का पुतला दहन किया। उन्होंने प्रदेश सरकार तथा आयोग के अफसरों के खिलाफ जमकर नारेबाजी भी की। पुतला दहन करने वालों में जिलाध्यक्ष गौरव त्रिपाठी, राजीव यादव, अनुराग राय आदि शामिल रहे।