पाकिस्तान की अपने दो अहम पड़ोसी देशों भारत और अफगानिस्तान के साथ रिश्तों में तल्खी वहां के उर्दू मीडिया में लगातार सुर्खियां बटोर रही है।
‘नवा-ए-वक्त’ की तीखी टिप्पणी है – शांति को पाकिस्तान की कमजोरी समझने वाले भारत को मुंह तोड़ जवाब देना ही वक्त की जरूरत है। अखबार का ये संपादकीय भारतीय सेना प्रमुख जनरल दलबीर सिंह के इस बयान पर है कि 'भारतीय सेनाओं को संक्षिप्त लड़ाई के लिए तैयार रहना चाहिए।
'खबार ने पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के इस बयान को सराहा है कि भारत छोटी या बड़ी, जिस भी तरह की जंग थोपने की कोशिश करे, उसे मुंह तोड़ जबाव दिया जाएगा। अखबार ने फिर एटमी हथियारों के इस्तेमाल की धमकी देते हुए लिखा है कि जंग हुई तो वो पारंपरिक नहीं रहेगी।
‘भारत को करें मजबूर’
रोजनामा ‘दुनिया’ लिखता है कि भारत के साथ दोस्ती और अमन की इच्छा रखने वाले प्रधानमंत्री नवाज शरीफ भी अब तो यह कहने को मजबूर हैं कि भारत का रवैया शांति के लिए खतरा है।
अखबार कहता है कि अलग अलग मंचों पर इस बात को उठाने की जरूरत है कि भारत पाकिस्तान से 1965 और 1971 में जंग कर चुका है और अब वो एक बार फिर अपने नाखून तेज कर रहा है।
वहीं ‘एक्सप्रेस’ की राय है कि पाकिस्तान विश्व समुदाय से कहे कि वो भारत को बातचीत की मेज़ पर आने के लिए मजबूर करे। भारत प्रशासित कश्मीर में भारतीय सेना पर 'ज़ुल्म ढाने' का इल्जाम लगाते हुए अखबार इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने की वकालत करता है। अखबार के मुताबिक़ इससे भी भारत पर दबाव बढ़ेगा और वो बातचीत के लिए मजबूर होगा और बातचीत के अलावा कोई चारा है भी नहीं।
'भारत का दखल'
वहीं ‘जसारत’ ने पाक अफगान रिश्तों में तनाव को दूर करने के लिए काबुल में अफगान नेताओं से पाकिस्तानी विदेश मामलों के सलाहकार सरताज अजीज की मुलाकातों पर संपादकीय लिखा है। अखबार इस तनाव के लिए कहीं ना कहीं भारत और अमरीका को ज़िम्मेदार बताता है।
अख़बार के मुताबिक़ अमरीका ने अशरफ गनी की सरकार में उन्हीं के प्रतिद्वंद्वी रहे अब्दुल्ला अब्दुल्ला को जगह दिलाकर वहां भारत समर्थक तत्वों को अपना काम करने की आजादी दे दी है।
अखबार आरोप लगाता है कि अज़ीज़ ने राष्ट्रपति गनी को पाकिस्तान में भारत की दख़लंदाजी के सबूत दिए। वहीं रोजनामा ‘इंसाफ’ ने पैगंबर मोहम्मद पर ईरान में बनी फ़िल्म की कड़ी आलोचना की है।
अखबार लिखता है कि चार करोड़ डॉलर की लागत से सात साल में बनी यह फिल्म मुसलमानों की भावनाओं को ठेस पहुंचाती है और पाकिस्तान को ईरान से अपने संबंधों का इस्तेमाल कर इसे रुकवाना चाहिए।
‘मंत्रियों की क्लास’
रुख भारत का करें तो ‘हिंदोस्तान एक्सप्रेस’ ने आरएसएस और भाजपा की समन्वय बैठक पर अपने संपादकीय को शीर्षक दिया है- केंद्रीय मंत्रियों की क्लास। अखबार कहता है कि आखिर एक केंद्रीय मंत्री ऐसे संगठन को अपने मंत्रालय से जुड़ी जानकारियां क्यों दे रहा है जिसकी कोई संवैधानिक हैसियत नहीं है।
अखबार का सवाल है कि आखिर संघ किस हैसियत से केंद्रीय मंत्रियों की क्लास ले रहा है, क्या ये कोई चुना हुआ संगठन है या फिर चुनी हुई सरकार के जरिए गठित कोई सलाहकार संस्था है? अखबार का आरोप है कि अब ये साफ़ हो गया है कि संघ न सिर्फ़ भाजपा को नियंत्रित करता है बल्कि सरकार बनने पर उसकी नीतियां भी तय करता है।
वहीं ‘हमारा समाज’ ने बिहार में जनता परिवार वाले गठबंधन से समाजवादी पार्टी के अलग हो जाने के नफा नुकसान पर संपादकीय लिखा है। अखबार कहता है कि बिहार में हालात ऐसे करवट ले रहे हैं कि महागठबंधन की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
अखबार की राय है कि एक तरफ समाजवादी पार्टी के फैसले से बीजेपी को फायदा हो सकता है, वहीं जेडीयू की चिंता असदउद्दीन औवेसी भी बढ़ा रहे हैं जो बिहार में अपने उम्मीदवार उतारने की तैयारी कर रहे हैं।