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पेशावर के बाद क्या कुछ बदला पाकिस्तान में?

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मेरे साथ पूरा मुल्क आज भी पेशावर में 132 बच्चों की मौत पर रो रहा है, लेकिन मुल्क में अब काफी कुछ बदल चुका है।
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पाकिस्तान में पहली बार किसी वजीरे आजम ने मुल्क के 8000 मुजरिमों की फांसी पर लगे बैन को हटाने का दमखम दिखाया है, पाक आर्मी चीफ जनरल राहील शरीफ खुद अफगानिस्तान गए और वहां की हुकूमत से दहशतगर्दों के खात्मे की पहल की, दहशतगर्दों को समर्थन देने वाले इमरान खान का नवाज के साथ एक मंच पर आना भी एक बड़ा बदलाव है।

आर्मी चीफ का 3000 आतंकियों को 48 घंटे के भीतर फांसी पर लटकाने संबंधी ट्वीट भी बदलाव का संकेत है। यह सब कुछ यहां पहली मर्तबा हुआ है। पूरे आवाम ने पाक आर्मी और हुकूमत पर जबरदस्त दबाव बना दिया है कि देश को दुर्दशा से बाहर निकालें।
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मैं अपने मुल्क में जो बदलाव देख रहा हूं वो भारत के लिए भी राहत भरा है, इसलिए अब भारतीय हुकूमत को भी चाहिए कि वह हर बात पर पाकिस्तान के सिर यह इल्जाम लगाना बंद करे कि पाक सिर्फ दहशतगर्दों के साथ है।

बहुत हो चुकी पाकिस्तान की पूरी दुनिया में बदनामी, अब तो आतंकवाद पर फैसला तुरंत हो, जिस देश में जो दहशतगर्द मिले, उसे तत्काल फांसी के तख्त तक पहुंचा दो। पाकिस्तान को भी चाहिए कि भारत की आवाज सुने।
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बदलाव से भारत को मिलेगा फायदा

दो टूक बात है कि अब पाकिस्तान की सारी पॉलिटिकल पार्टियों का भविष्य इस बात पर है कि उन्हें आवाम को जिंदा रखना है या जिल्लत भरी जिंदगी देनी है।

यह भी एक बदनसीबी रही है पाकिस्तान की कि यहां चाहे हक्कानी नेटवर्क हो या गुल ग्रुप, दहशतगर्दों के सभी हिमायतियों को अब तक हुक्मरानों का समर्थन मिलता रहा है, अब इस नजरिए में बदलाव आया है।

मैं मानता हूं कि जिया उल हक के बाद से लेकर कियानी तक सभी आर्मी चीफ दहशतगर्द ताकतों का किसी न किसी तरह साथ देते रहे थे। इसके चलते पाकिस्तान की इकॉनॉमी बर्बाद हो चुकी है, सभी तरफ दहशतगर्दी के निशान दिख रहे हैं, तरक्की रुक चुकी है, लेकिन पेशावर हादसे के बाद हालात बदले हैं।

वैसे भी जनरल राहील शरीफ शुरू से ही दहशतगर्दों के खिलाफ रहे हैं। अब तक उनकी कार्रवाई में हुकूमत को सिर्फ इत्तेला दी जाती थी, लेकिन अब बाकायदा नवाज शरीफ से गुफ्तगू की जा रही है। इसे अच्छी शुरूआत के रूप में लिया जाना चाहिए।

(भूपेश गुप्ता से फोन पर हुई बातचीत पर आधारित)
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