जिस दौसा ने भारतीय राजनीति को राजेश पायलट जैसा किसान नेता दिया था, वहां के एक किसान (नेता?) ने देश की संसद की दहलीज पर फांसी लगा ली।
अगर पुलिसकर्मी थोड़े सक्रिय होते, आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता सत्ता के अहंकार में होने के बजाय सचमुच किसानों के प्रति प्रतिबद्ध होते, और कुमार विश्वास तथा अरविंद केजरीवाल भाषण देने के बजाय गजेंद्र को बचाने की कोशिश करते, तो तस्वीर बदल सकती थी। पर तब यह देश हमारी राजनीतिक पार्टियों के घड़ियाली आंसू, पीत पत्रकारिता को मात करते टेलीविजन चैनलों के पक्षपाती रवैये और उसके स्टूडियो में बैठे 'आर्मचेयर इंटेलेक्चुअलों' के ज्ञान से वंचित रह जाता।
अगर गजेंद्र बच जाता, तो यह देश आप और भाजपा के आरोप-प्रत्यारोप तथा दिल्ली सरकार और पुलिस के बीच अधिकारों की लड़ाई के सार्वजनिक प्रदर्शन का गवाह बनने से वंचित रह जाता।
गजेंद्र के मामले में आम आदमी पार्टी से लगातार गलतियां हुईं, जो बताती हैं कि एक सत्तारूढ़ राजनीतिक पार्टी के तौर-तरीके सीखने में उसे समय लगेगा। संजय सिंह और कुमार विश्वास जैसे आप के सिपहसालार मुंह खोलते हैं, तो बुरी तरह घिर जाते हैं। और आशुतोष के पश्चाताप के आंसू द्रवित जितने भी करते हों, एक राजनेता के तौर पर उनकी कमजोरी ही जाहिर करते हैं। इनके अलावा स्याही का ताजा-ताजा निशाना बने सोमनाथ भारती जैसे पिटे हुए मोहरे हैं।
अगर यही लोग अरविंद केजरीवाल की सरकार के खेवनहार हैं, तो आप का अल्लाह मालिक है। दूसरी ओर, गजेंद्र की मौत पर भाजपा ने जो तेवर दिखाए हैं, उससे लगता है, भूमि अधिग्रहण अध्यादेश पर बुरी तरह घिरी मोदी सरकार को ऐसी ही किसी अवसर की प्रतीक्षा थी, ताकि असली मुद्दे को पीछे कर किसी दुश्मन को निशाना बनाया जा सके। संसद में नौसिखिए राहुल गांधी से लगातार मात खाती सरकार ने गजेंद्र की मौत पर आप को जिस तरह निशाना बनाया है, वह उसकी संवेदना कम, खिसियाहट का नमूना ज्यादा है।
अगर किसानों के प्रति संवेदना असली है, तो यह शोक सिर्फ गजेंद्र तक ही सीमित क्यों? बुधवार की शाम को गजेंद्र की मौत हुई, जबकि मंगलवार की रात बिहार में चक्रवाती तूफान ने करीब पचास लोगों की जान ली और सैकड़ों लोग घायल हुए। यानी बुधवार दोपहर से पूरी रात और पूरा अगला दिन जब दिल्ली की राजनीति गजेंद्र सिंह की दुखद मौत के इर्द-गिर्द थी, और एबीपी जैसे टेलीविजन चैनल गजेंद्र की मौत के लिए आप को जिम्मेदार ठहरा रहे थे।
अभिसार शर्मा जैसे एंकर इस जुर्म के लिए अरविंद केजरीवाल समेत उनके साथियों को जैसे फांसी की सजा बस सुनाने ही वाले थे, तब तक उत्तर बिहार में चक्रवाती तूफान के थमने के बाद अनेक घरों में जीवन भी थम गया था।
बिहार की त्रासदी छोटी नहीं थी। चक्रवाती तूफान से, जिसके आने की पूर्व सूचना तक नहीं थी, दस हजार से अधिक घर उजड़ गए, हजारों पेड़ उखड़ गए, बारिश और ओलावृष्टि से फसल बर्बाद हो गई, यातायात से लेकर बिजली आपूर्ति ठप हो गई। अकाल मौत मरे इन लोगों में से ज्यादातर गरीब थे। जिस पूर्णिया में त्रासदी सबसे भीषण हुई, वहां कई लोगों को तूफान ने घर से बाहर निकलने का मौका तक नहीं दिया। कोसी प्रांतर के असंख्य परिवारों में दो जून के भोजन और सिर पर छत के लिए अभी महीनों जद्दोजहद रहेगी।
बिहार से दिल्ली बहुत दूर नहीं है। दिल्ली से सर्वाधिक रेलगाड़ियां बिहार जाती हैं। बिहार से रोजी-रोटी की तलाश में सर्वाधिक लोग दिल्ली आते हैं। दिल्ली में छोटे-मोटे धंधों से लेकर मीडिया तक में बिहार के लोगों की संख्या बहुत अधिक है। उस बिहार में इस साल विधानसभा चुनाव भी है। इसके बावजूद बिहार की त्रासदी टेलीविजन चैलनों पर नहीं थी! राजनेता तो चूंकि राजनेता हैं, वे बिहार की त्रासदी पर बाद में भी संवेदना जताने के लिए स्वतंत्र थे, पर गजेंद्र की मौत पर स्तब्ध टीवी चैनलों को दो दिन तक बिहार की त्रासदी क्यों नहीं दिखी? क्या आपके टेलीविजन चैनलों पर दिखने के लिए किसानों को दिल्ली में मरना पड़ेगा?
टेलीविजन चैलनों के इस एप्रोच से दो चीजें साफ हुई हैं। एक, उन्हें खेती-किसानी से कुछ लेना-देना नहीं है। अगर होता, तो वे फसल बर्बाद होने से आत्महत्या कर चुके करीब डेढ़ सौ किसानों के लिए भी टेलीविजन पर थोड़ी-बहुत जगह देते। गजेंद्र की मौत के बाद भी किसानों की खुदकुशी थमी नहीं है, लेकिन इन कथित टेलीविजन चैलनों पर उनका कोई जिक्र नहीं है। दूसरे, गजेंद्र की मौत पर हंगामा करके उन्होंने खेती से जुड़े असल मुद्दे से ध्यान भटकाकर खुद को मोदी सरकार का भोंपू साबित किया है।