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विपक्ष ने रोका सांप्रदायिक हिंसा बिल

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यूपीए-2 के कार्यकाल के अंतिम संसद सत्र के पहले दिन ही साफ हो गया कि सरकार की ओर से पेश किए जाने वाले बिलों के पास होने के आसार कम हैं। राज्यसभा में विपक्ष ने सरकार के महत्वाकांक्षी सांप्रदायिक हिंसा बिल का रास्ता रोककर इसकी शुरुआत कर दी है।
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भाजपा सहित सभी विपक्षी पार्टियों ने जता दिया है कि सरकार के तथाकथित चुनावी एजेंडे वाले बिलों पर सहयोग नहीं किया जाएगा। अब छह भ्रष्टाचार विरोधी बिलों के साथ तेलंगाना गठन संबंधी बिल पर भी खतरे के बादल मंडराने लगे हैं। गौरतलब है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी तेलंगाना और राहुल गांधी भ्रष्टाचार विरोधी बिलों को पास कराने पर खास जोर दे रहे हैं।

सत्र के पहले दिन के माहौल को देखते हुए वित्तमंत्री पी. चिदंबरम ने आशंका जताई है कि वित्तीय बिल को छोड़ किसी बिल के पास होने की उम्मीद सरकार को नहीं है। उधर गैर कांग्रेस और गैर भाजपा गठबंधन वाले 11 दलों के गुट ने भी दो टूक कह दिया है कि सदन के सुचारु रूप से चले बिना वह किसी बिल को तवज्जो नहीं देंगे। उधर तेलंगाना विरोधी सांसद दोनों सदनों में हंगामा करने पर आमादा हैं।
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दलीलों के बावजूद राजी नहीं हुआ विपक्ष

बुधवार को राज्यसभा में विपक्ष ने एक सुर में कहा कि सांप्रदायिक हिंसा पर कानून बनाना संसद के अधिकार क्षेत्र से बाहर है। यह मामला कानून व्यवस्था से जुड़ा है, लिहाजा राज्यों को इस बारे में अपना कानून बनाना होगा ना कि केंद्र को। कानून मंत्री कपिल सिब्बल की कई दलीलों के बावजूद विपक्ष राजी नहीं हुआ।

उपसभापति पी जे कुरियन ने सदन की मंशा के आधार पर बिल को स्थगित कर दिया। सिब्बल ने अपनी दलील में 2002 के गुजरात दंगों का हवाला देते हुए भाजपा को घेरने की कोशिश की। सिब्बल ने कहा कि सांप्रदायिक हिंसा सिर्फ कानून व्यवस्था से नहीं जुड़ा है, क्योंकि कई मामलों में राज्य सरकार खुद दंगों को प्रोत्साहित करती हैं।

सिब्बल के मुताबिक यह बिल वैसे भी दंगों के मामले में राज्यों से कानून व्यवस्था का अधिकार नहीं छीन रहा। बिल के प्रावधान मूल रूप से  हिंसा की जिम्मेदारी तय करने से जुड़े हैं। इसमें राज्यों के संघीय अधिकारों का पूरा खयाल रखा गया है। लेकिन सिब्बल की दलील का कोई असर विपक्ष पर नहीं हुआ। भाजपा के साथ सीपीआई, सीपीएम, डीएमके, एआईएडीएमके और समाजवादी पार्टी के सांसद लगातार इसके विरोध में खड़े रहे।

पहले ही दिन हंगामे की भेंट चढ़ी कार्यवाही

संसद के शीतकालीन सत्र के पहले दिन की ही कार्यवाही हंगामे की भेंट चढ़ गई। लोकसभा की कार्यवाही जहां दो बार के स्थगन के बाद दिन भर के लिए स्थगित करनी पड़ी, वहीं राज्यसभा की कार्यवाही भी तीन बार के स्थगन के बाद दिन भर के लिए स्थगित करनी पड़ी।

राज्यसभा में हंगामे के कारण सांप्रदायिक हिंसा विरोधी बिल पारित कराने का सरकार का मंसूबा धरा का धरा रह गया। भाजपा, तेलंगाना पर आंध्र प्रदेश के सांसदों के तीखे रुख और सरकार को सदन में घेरने के लिए बुधवार को ही बने कांग्रेस-भाजपा विरोधी गुट के रुख के चलते भविष्य में भी सदन की कार्यवाही में बाधा पड़ने के पूरे आसार हैं।
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तेलंगाना के समर्थन और विरोध में नारेबाजी

लोकसभा की कार्यवाही शुरू होते ही तेलंगाना राज्य के समर्थक और विरोधी सांसद वेल में आकर नारेबाजी करने लगे। इसी बीच अकाली दल के सांसदों ने सिख विरोधी दंगा और ऑपरेशन ब्लूस्टार मामले में ब्रिटेन से ली गई मदद पर हंगामा शुरू कर दिया।

हंगामा और नारेबाजी खत्म करने की कोशिशों के विफल होने के बाद स्पीकर ने सदन की कार्यवाही 12 बजे तक के लिए स्थगित कर दी। सदन की बैठक 12 बजे दोबारा शुरू हुई लेकिन हालात में कोई बदलाव नहीं आया। सरकारी कामकाज निपटाने के बाद स्पीकर ने पूर्वोत्तर के छात्र की हत्या के मामले में सदस्यों को बोलने का मौका दिया।

इसी बीच उन्होंने सदन के दो सदस्यों का इस्तीफा स्वीकार करने के साथ ही तेलंगाना मामले में कांग्रेस सहित अन्य दो दलों के सरकार के खिलाफ दिए गए अविश्वास प्रस्ताव पर फैसला हंगामे के कारण टाल दिया। बाद में हंगामे के बीच ही उन्होंने पूर्वोत्तर के छात्र की हत्या की निंदा के साथ ही सदन की कार्यवाही बृहस्पतिवार तक के लिए स्थगित कर दी।
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