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जानिए कौन है गुजरात के जंगल का एक 'शेर'?

Sat, 08 Mar 2014 08:18 AM IST
वेद विलास उनियाल/अमर उजाला, नई दिल्ली
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पिछले चुनाव में गुजरात में गिर के जंगलों में एक पोलिंग बूथ ऐसा था जहां केवल एक वोटर था। वह वोटर वहां बने एक मंदिर का पुजारी था। वोटर की वजह से पूरा चुनावी तामझाम करना पड़ा।
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वकायदा सभी अधिकारी, पॉलिटिकल पार्टियों के एंजेट, मतदान बैलेट पेपर और मतदान कक्ष उसी तरह तैयार किया गया जिस तरह आम पोलिंग बूथ तैयार होते हैं। मतदान की गोपनीयता का पूरा ध्यान रखा गया। पता नहीं चला कि मंदिर के पुजारी ने वोट कब किया? लेकिन अधिकारी शाम मतदान के निश्चित समय पूरा होने के बाद ही वहां से गए थे।

गिर के जंगलों में उस पुजारी को भी लोगों ने मजाक में यही कहा कि वह भी एक शेर की तरह है, उस अकेले व्यक्ति के लिए चुनाव अधिकारियों को पूरी कवायद करनी पड़ी। इस बार भी वहां पुजारी कह रहे हैं कि वही अकेले वोटर हैं। कोई दूसरा वोटर नहीं है।
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इनकी लाठी, उनके पत्थर

दिल्ली के लोगों के लिए यह बात हैरानी की हो सकती है कि आप वालों को सड़क पर इतने पत्थर कहां से मिल गए? उन्हें इस बात की भी हैरानी हो सकती है कि जहां पत्थर बरसे वहां से तावड़तोड़ इतनी लाठियों का इंतजाम कैसे हो गया? हालांकि यह तो प्रारंभिक दौर था। बाद में तो झाड़ू-डंडा-मुक्का सब चलने लगा। बात यह नहीं कि शुरुआत किसने की? आप वाले भाजपा आफिस के सामने जमा क्या हुआ अच्छा खासा दंगल हो गया।

दिल्ली वाले कह रहे हैं कि जिस जगह नुमाइश हुई वहां आम तौर पर इतने पत्थर कहां से आ गए? सड़क किनारे भी इतने पत्थर नहीं रहते। फिर टीवी पर रामायण महाभारत सीरियल के शस्त्रों की तरह पत्थर की बरसात कैसे होने लगी? क्या पहले से इस बात के लिए प्रबंध था कि प्रदर्शन-नारों के आगे भी जाया जा सकता है। इसी तरह लाठियां भी क्या पहले से सजा-संवार कर रखी गई थी कि कोई आया तो ताबड़तोड़ बांट ली जाएंगी। जो होना था वह हो गया। पत्थर वाले कह रहे हैं कि पहले लाठी चली, कुछ तिनके भी हमारी ओर उड़े फिर जवाब में पत्थर फेंके गए। लाठी वाले कह रहे हैं कि वो तो दफ्तर के अंदर ही आने लगे थे, पत्थर आने लगे तो लाठी से बैलेंस हो सकता है। दोनों तरफ से छोटे संग्राम को रोकने की कोशिश नहीं हुई। जब तक माफी मांगी जाती, तब तक काफी कुछ बिगड़ गया था।

दिल्ली वाले इतने में संतोष मना रहे है कि कोई अनहोनी नहीं हुई। दो चार खरोंच ही दिखा पा रहे हैं नेता। लोकतंत्र के प्रेमी इसी बात पर डर रहे हैं कि पिछले कुछ सालों से चुनाव प्रचार में आम बोलचाल में चाहे अपशब्द बोला गया हो, तू-तू मैं-मैं हुई हो, लेकिन पत्थर लाठी का ज्यादा जोर नहीं रहा, कहीं फिर यह मारक शैली लौट कर न आए। चलिए इतना काफी है कि कुछ बड़े नेताओं ने इस तरह की घटना में संयम दिखाया है। वरना कुछ नए नेता तो उत्साह में फाटकों के ऊपर भी चढ़ गए थे।

मीसा के लिए

रीता बहुगुणा कहती है कि लालूजी की सद्भावना है कि उन्होंने अपने लड़के के बजाय लड़की को चुनाव मैदान में उतारा। लालूजी और उनकी पार्टी इस समय भी कांग्रेस के पाले में हैं। इसलिए लालूजी जो भी करें वह कांग्रेस के लिए सरमाथे पर। वरना यह वही मीसा हैं जिनका नाम लालू ने आपातकाल की जेल से बाहर आकर रखा था। मीसा लगने से लालू जेल में बंद थे। जेल से छूटे तो बेटी का नाम मीसा रख दिया।

लालू ने तब कहा था कि उन्होंने अपनी बेटी को यह नाम इसलिए दिया कि हमेशा आपातकाल के जुर्म की याद बनी रहे। समय बीत गया आज वही मीसा आज अपना पहला लोकसभा चुनाव ल़ड़ने जा रही है। कोई उलटफेर नहीं हुआ तो वह पाटलिपुत्र से चुनाव लड़ेंगी। उनको संसद में पहुंचाने के लिए लालू ने अपने विश्वस्त को भी नाराज कर दिया। वक्त का फेर हैं कभी जिस कांग्रेस के प्रति गुस्से का इजहार के चलते एक लड़की को मीसा नाम मिला, आज उसी मीसा के लिए कांग्रेस प्रचार करेगी।

लालू और कांग्रेस के नेता एक मंच पर होंगे। मंच पर मीसा का नाम का उद्घघोष होगा, लेकिन उस मीसा का नाम कोई भूल कर नहीं लेगा, जिसकी यातना में युवा लालू नेता बनकर उभरे। राजनीति का यही चक्र है।

अब तुम भी सुनो सवाल

अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया किसी भी मुद्दे पर सवाल बनाने में दक्ष हैं। किसी भी मामले में सोलह सत्रह सवाल बनाना उनके लिए बाएं हाथ का खेल हैं। इसलिए दिल्ली में वह अऩोखी रीत कर गए कि कांग्रेस से समर्थन लेने के एवज में 16 सवाल पूछे गए। होता तो यही था कि समर्थन देने वाला अपनी कुछ शर्त रखता था। पर आप पार्टी का यह लाजवाब अंदाज था कि समर्थन देने वाले के सामने कुछ सवाल रखे गए।

इसी तर्ज पर केजरीवाल और मनीष सिसोदिया की जोड़ी गुजरात में गए तो मोदी सरकार को लेकर उनके पास 16 सवाल थे। भाजपा ने भी देर नहीं की। शाम तक भाजपा ने भी पलट कर 16 सवाल पूछे हैं। सवाल दर सवाल, बदले में सवाल का यह खेल अब चलता रहेगा। पता नहीं सवाल का कोई जवाब भी होगा लेकिन सवाल के बदले सवाल अब होते रहेंगे।

मोदी पर पूछे गए सवाल पर जवाब न देकर बदले में सवाल पूछ कर भाजपा ने यह तो जता ही दिया कि सवाल पूछने का एकाधिकार आप वालों के पास नहीं रहेगा। उनसे भी सवाल पूछे जाएंगे। एक दो नहीं, पूरे सोलह। राजनीति की बिसात में अब सवाल ही सवाल होंगे। पर क्या कहीं जवाब भी होगा।
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सेलिब्रिटी से सजाएंगी पार्टी

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी ने सेलिब्रिटी को पार्टी के साथ जोड़ने में दूसरों को बहुत पीछे छोड़ दिया। दीदी पहले मिथुन दा को राज्यसभा में लाई। अब लोकसभा के टिकट के लिए उन्होंने बंगाल के अलग अलग क्षेत्रों के कई चर्चित लोगों को पार्टी के साथ जोड़ दिया। विख्यात फुटबाल खिलाड़ी वायचुंग भूटिया, गुजरे जमाने की स्टार मुनमुन सेन सहित कुछ और सेलिब्रिटी को टिकट दिया है।

बंगाल में फुटबाल की लोकप्रियता और वायचुंग भूटिया जैसे जाने माने खिलाड़ी को साथ लेकर दीदी ने अपना पासा चल दिया। इससे पहले मिथुन चक्रवर्ती को राज्यसभा में ला चुकी हैं। इस तरह सेलिब्रिटी को जोरशोर से टिकट दे रही हैं। उनकी सोच यही है कि बंगाल का भावुक जनमानस अपने सितारों के लिए उमड़ पड़ेगा। कहा तो जा रहा है कि करीब दस टिकट सेलिब्रिटी के नाम पर ही बांटने की योजना है।

यानि सोच यही है कि तृणमूल सरकार की अपनी ताकत और सेलिब्रिटी की अपनी लोकप्रियता काम कर जाए तो फिर वारा-नारा हो जाए। सेलिब्रिटी को साथ में जोड़ने और टिकट देकर संसदीय सीट में हलचल मचाने की कोशिश तो आप पार्टी ने भी की। लेकिन दीदी का सेलिब्रिटी जोड़ना कुछ ज्यादा भावुकता से भरा है। वजह यही है कि न वो फिलहाल बंगाल से बाहर की सोच रही है, न बंगाल से बाहर की सेलिब्रेटी की।
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