फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

दुश्मन से भिड़ने को तैयार देश की ये बेटियां

विज्ञापन
विज्ञापन
भारत-पाक अंतरराष्ट्रीय सीमा पर अपनी बेटियों को सरहद की रखवाली करते देख किसी भी भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो सकता है। ये युवतियां सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) में कांस्टेबल हैं।
विज्ञापन


इन्होंने अपने जोश और जज्बे से साबित कर दिया कि महिलाएं यूं ही पुरुषों से बराबरी का दावा नहीं करतीं। वक्त आने पर वे उतनी ही जिम्मेदारी और हौसले से फर्ज का निर्वाह भी करती हैं।

दो साल पहले बीएसएफ में भर्ती हुईं महिला कांस्टेबलों के हौसले और कर्तव्यनिष्ठा की उनके अधिकारी भी दाद देते हैं। खास बात यह है कि इनमें से ज्यादातर जवान या किसान की बेटियां हैं।
विज्ञापन


कांस्टेबल किरण, पंपिदर और सुषमा एलएमजी, एक्स-95 व इनसास सहित सभी तरह के हथियार चलाने में दक्ष हैं। इन्हीं की तरह सांबा की तीन और बेटियां पूजा शर्मा, लक्ष्मी देवी शर्मा और अंजू बाला भी अंतरराष्ट्रीय सीमा पर देश की सीमा की सुरक्षा में तैनात हैं।

मां-बाप से झगड़ी, तो सिपाही बन गई

पपिंदर कौर सांबा के सीमांत क्षेत्र बैनग्लाड के रहने वाले पूर्व सैनिक जगतार सिंह की बेटी हैं। वे बताती हैं कि स्कूल के दिनों में कोई साफ योजना तो नहीं थी, लेकिन एक ख्वाब जरूर था कि मेरा परिवार और मेरा गांव मुझ पर नाज करे।

उन्होंने बताया कि इसी बीच एक दिन माता-पिता से किसी बात पर मामूली सा झगड़ा हो गया। मुझे बहुत गुस्सा आया। सोचा कि अब अपने दम पर कुछ करने का समय आ गया है।

तभी पता चला कि बीएसएफ में महिला कांस्टेबल की भर्ती के लिए फार्म निकले हैं। बस आज आपके सामने उस रूप में खड़ी हूं जिस पर मेरे माता-पिता को भी मुझ पर फख्र है।

डर! वह तो पास भी नहीं फटकता

पटोली ब्राह्मणा की रहने वाली सुषमा कुमारी ग्रेजुएट हैं। पिता बिशन दास भी पूर्व सैनिक हैं। फर्राटे से डोगरी, हिंदी और अंग्रेजी बोलने वाली सुषमा बताती हैं, वह स्कूल के दिनों में ही बेल्ट फोर्स की नौकरी करने का मन बना बैठी थीं।

मौका मिलते ही बीएसएफ में भर्ती हो गईं। अब डिपार्टमेंटल टेस्ट पास कर अफसर बनने की कोशिश में हैं। यह पूछने पर कि उन्हें डर नहीं लगता, तो उनका कहना था कि जब वे ड्यूटी पर तैनात होती हैं तो उनमें एक अजीब सा जोश भर जाता है और फिर डर कहीं आसपास नहीं फटकता।
विज्ञापन

अब तो यही अपना परिवार हो गया

सरहद पर ही हाथ में बंदूक लेकर पूरी मुस्तैदी से ड्यूटी में तल्लीन किरण बाला को बीएसएफ कांस्टेबल की अपनी मौजूदा भूमिका पर फख्र है। विजयपुर के कीसो गांव के किसान बूटी राम की बेटी किरण बताती हैं कि उनके साथ बीएसएफ कैंप में अधिकतर लोग दूसरे राज्यों से हैं, पर दो साल में कभी महसूस नहीं हुआ कि वे परिवार से दूर हैं। सब लोग बेहद अपने हो गए हैं।

बेल्ट फोर्स की नौकरी करने का कभी सोचा हीं नहीं था। पिता जी दुकानदार हैं। दो भाई हैं। बड़ा भाई नौकरी की तलाश में है और छोटा दसवीं का छात्र है।

कानाचक्क बार्डर आउट पोस्ट पर तैनात सांबा जिले के पंज टीला गांव की लक्ष्मी देवी शर्मा बताती हैं कि 12वीं कक्षा पास करने के बाद पता चला कि बीएसएफ में भर्ती हो रही है तो रहा नहीं गया और फार्म भर दिया। भगवान की कृपा से देश सेवा का मौका मिला और आज देश की सरहद पर तैनात हूं।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें