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ओबामा के दूसरे कार्यकाल में संबंधों को मिलेगी नई बुलंदी

Wed, 07 Nov 2012 11:18 PM IST
कवंल सिब्बल/नई दिल्ली
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अमेरिका में चुनाव पूर्व सबसे पहली बहस में मिट रोमनी की बराक ओबामा पर बढ़त से मुझे लग रहा था कि भारत के साथ अमेरिकी संबंधों में कहीं कमजोरी न आ जाए, लेकिन अब जीत के बाद ओबामा के हाथों में एक बार फिर अमेरिका की बागडोर आने से मैं पूरी तरह आश्वस्त हो चला हूं कि भारत के साथ अमेरिकी इबारत नए मुकाम गढ़ने की तैयारी में है।
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रोमनी की बढ़त के चलते मुझे जो कारण परेशान कर रहा था वह यह कि अमेरिका के श्वेत अमीरों की लॉबी एक बार फिर भारत को कहीं अपने राजनीतिक स्वार्थों का अखाड़ा न बना दे। लेकिन ईश्वर का शुक्र है कि अमेरिका में अश्वेतों का बीस फीसदी मत स्विंग स्टेट्स में ओबामा को जीत को आधार दे गया।

अब तय है कि भारत के साथ न सिर्फ चीन और पाकिस्तान के मोर्चों पर एक शक्तिशाली साथी मिल गया है, बल्कि कश्मीर विवाद और संयुक्त राष्ट्र में स्थायी सदस्यता के मामले में भी भारत की आवाज बुलंद करने का मंच पुख्ता हो गया है।
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वैसे ओबामा के पहले कार्यकाल का शुरुआती दौर बहुत ज्यादा भारत के पक्ष में नहीं था, लेकिन जैसे-जैसे अमेरिका आर्थिक संकट के दौर से निकलने की जद्दोजहद करने लगा, वैसे-वैसे ओबामा को भारत-चीन का महत्व समझ में आने लगा। ओबामा ने इनमें से भारत को सहयोगी चुना क्योंकि चीन के साथ दोस्ती खतरनाक हो सकती थी।

इसीलिए पाकिस्तान के कई मामलों में अमेरिका भारत के साथ खड़ा रहा। भारत ने भी चाहे अफगानिस्तान में सैन्य सहयोग का मसला हो या ईरान के साथ तेल सौदे का मामला, अमेरिका का पूरा साथ दिया। ओबामा प्रशासन आने वाले दिनों में आर्थिक बुलंदियों के लिए अपनी जिन नीतियों का विस्तार करेगा उसका फायदा भारत को मिलना तय है।

ओबामा अपने चुनाव अभियान में कई बार पाकिस्तान को दी जाने वाली सैन्य सहायता में कटौती और आतंक के खिलाफ भारत के समर्थन को दोहराते रहे हैं, इसका दूसरे कार्यकाल में भारत को फायदा मिलेगा। कई अहम अंतरराष्ट्रीय मसलों पर दादागिरी का रवैया अपनाने वाले चीन पर ओबामा की जीत के साथ दबाव बढ़ा है।

चीन के मामले में अमेरिका ने भारत का कूटनीतिक इस्तेमाल जरूर किया है लेकिन अमेरिकी हितों से जुड़े मामलों में चीन का अड़ियल रवैया कुछ हद तक भारत के लिए फायदेमंद साबित होगा। चीन पर दबाव बनाने की रणनीति के तहत अमेरिका के पास अब दक्षिण एशिया में भारत से मजबूत और भरोसेमंद साथी और कोई नहीं है। इसलिए भी ओबामा अपने दूसरे कार्यकाल में भारत के साथ साझेदारी को और मजूबत करेंगे।

यदि मैं ओबामा के पहले कार्यकाल को आधार मानूं और चुनाव अभियान में आउटसोर्सिंग पर उनके बयानों का विश्लेषण करूं तो निश्चित ही कुछ नकारात्मक रवैया मुझे दिखाई देता है। इनमें एचवन-बी वीजा फीस बढ़ाने का मामला मेरी नकारात्मक भावनाओं को और भी मजबूती देता है, लेकिन भारत अमेरिका संबंधों को सिर्फ आईटी सेक्टर से जोड़ कर नहीं देखा जा सकता। इन संबंधों का दायरा काफी विस्तृत और समग्र है और इसे उसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए।
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(लेखक पूर्व विदेश सचिव व राजनयिक हैं)

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