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डोभाल के इशारे पर हुआ जासूसी कांड का पर्दाफाश

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पेट्रोलियम मंत्रालय में दस्तावेजों की चोरी और जासूसी के मामले ने देश भर में सनसनी फैला दी है। जासूसी के मामले में अब तक 12 लोगों को गिरफ्तारी हो चुकी है। पुलिस के मुताबिक जासूसी का मामला वित्त, कोयला और ऊर्जा मंत्रालय तक फैला है।
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पुलिस को आरोपियों के पास से वित्तमंत्री अरूण जेटली के बजट भाषण के इनपुट भी मिले हैं। मामले में गिफ्तारी तीन दिन पहले शुरु हुई है, जबकि जांच चार महीने से चल रही है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, खुफिया एजेंसियां राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के कहने पर चार महीने पहले से जांच कर रही थीं।

दरअसल डोभाल ने मीडया में क्लासीफाइड मामलों की लगातार रिपोर्टिंग होने के बाद मंत्रालयों के भीतर जासूसी होने की आशंका जताई थी। तकरीबन चार महीने पहले एक टीवी रिपोर्ट में बताया गया था कि डीआरडीओ के एक फंक्शन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आईएएनएस अरिहंत की तस्वीरें दिखाई गईं। आईएनएस अरिहंत एक परमाणु पनडुब्बी है और उसकी सूचनाएं क्लासीफाइड सूचनाओं की श्रेणी में आती हैं।
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क्लासीफाइड सूचनाएं लीक होने के बाद गहराया शक

डोभाल ने रिपोर्ट पर सख्त आपत्ति जताई थी और कहा था कि अरिहंत के बारे में ऐसी जानकारियों को प्रसारण ऑफिसियल सिक्रेट एक्ट के तहत अपराध है। उन्होंने अक्टूबर में इस संबंध में कैबिनेट सचिव अजीत कुमार सेठ को पत्र भी लिखा था। उसके बाद ही उन्होंने रॉ को मामले की जांच के आदेश दिए।

डोभाल ने कहा था कि अधिकांश सूचनाएं सरकारी कार्यालयों से लीक हो रही हैं और क्लासीफाइड जानकारियों के लिए बने प्रोटोकॉल का पालन नहीं किया जा रहा है। सेठ ने उस समय मामले को मं‌त्रियों के समक्ष भी उठाया था।

जांच में पहला संदिग्ध पेट्रोलियम मंत्रालय के चपरासी आशाराम में रूप में सामने आया। पिछले दो दिनों में हुई गिरफ्तारियों में वह जासूसी रैकेट की एक अहम कड़ी बनकर भी उभरा है।
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जांच एजेंसियों के जाल में फंसते चले गए संदिग्ध

डोभाल के पत्र के बाद मंत्रालयों और तमाम विभागों को सुरक्षा और निगरानी कड़ी करने के आदेश दिए गए। जांच के दौरान दर्जनों फोन नंबरों की बातचीत को रिकॉर्ड भी किया गया। टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, जांच एजेंसियों के पास सबूत के रूप में सैकड़ों घंटों की रिकार्डिंग भी है।

जांच एजेंसियों ने सबूत जुटाने के लिए कई बार फर्जी दस्तावेज बनाए। उन्हें इस प्रकार रखा गया कि वे बहुत महत्वपूर्ण लगे और जासूसी में लगे लोग उन दस्तावेजों को चुराएं।

कई बार जासूसी कर रहे लोगों की पहचान करने के लिए जांच एजेंसी के लोगों ने ही आपस में नकली बातें कि और ऐसा जाहिर किया कि जैसे वे बहुत जरूरी बात कर रहे हों। दरअसल ये संदिग्धों की पहचान करने के ‌लिए बिछाए गए जाल थे। संदिग्ध बड़ी आसानी से इसमें फंसते भी चले गए।
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