2014 के लोकसभा चुनाव से पहले के सेमीफाइनल में भाजपा की सफलता ने ब्रांड नरेंद्र मोदी को हिट बना दिया है। लेकिन मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान की उम्मीदों से बढ़कर जीत की हैट्रिक ने भाजपा थिंक टैंक को भविष्य की योजनाएं बुनने का एक और विकल्प मुहैया करा दिया है।
खासतौर पर पार्टी में हाशिए पर चले गए अटल-आडवाणी की विचारधारा पर चलने वाले उदारवादियों को न सिर्फ आवाज मिल गई है बल्कि शिवराज के नाम पर दांव लगाने में उन्हें अब कोई हिचक भी नहीं होगी।
शिवराज जब पहली बार मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे तब यह कहा गया यह गद्दी उन्हें उनकी बदौलत नहीं बल्कि उमा भारती की मेहनत के रूप में मिली है।
दूसरी बार जब वह राज्य के मुख्यमंत्री बने तो कहा गया सही मायनों में यह उनकी पहली जीत है। अब पार्टी में भी शिवराज की इस जीत के बाद उनके खिलाफ कहने को कुछ नहीं है।
राजस्थान की तरह मध्य प्रदेश में नरेंद्र मोदी के नाम का पार्टी ने ज्यादा इस्तेमाल नहीं किया। यहां तो शिवराज के काम का और उनकी योजनाओं का जादू चला।
किसानों के अलावा सेवा का अधिकार और लक्ष्मी लाडली जैसी योजनाओं ने राज्य में उनके कद को इतना ऊंचा कर दिया कि उन्हें मोदी के नाम की जरूरत भी नहीं पड़ी। मोदी से ठीक अलग ईद पर उन्होंने मुसलिम टोपी को भी अपना लिया।